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Chandigarh News: शिअद के लिए पंथक वोटरों की नाराजगी खतरे की घंटी

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सुरिंदर पाल
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जालंधर। शिरोमणि अकाली दल, जिसे कभी पंजाब की पंथक राजनीति की रीढ़ माना जाता था, आज अपने सबसे कठिन दौर से गुजर रहा है। एक समय गुरुद्वारों की मर्यादा और सिख अधिकारों की आवाज कहलाने वाला दल लगातार गिरते वोट प्रतिशत, पंथक वोटरों की नाराजगी और संगठनात्मक कमजोरियों से जूझ रहा है।
हालांकि तरनतारन उपचुनाव में अकाली दल का ग्राफ बढ़ा था लेकिन 328 श्री गुरु ग्रंथ साहिब स्वरूपों के गायब होने की घटना में दर्ज अपराधिक मामले ने पार्टी की स्थिति और असहज कर दी है। खासकर सीए सतिंदर सिंह कोहली की गिरफ्तारी के बाद, जो अकाली दल सुप्रीमो सुखबीर बादल के नजदीकी माने जाते हैं।
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1997, 2007 और 2012 में अकाली दल ने पंथक वोट बैंक के बल पर सत्ता में वापसी की लेकिन 2015 की बेअदबी घटनाओं, बरगाड़ी और कोटकपूरा गोलीकांड के बाद पंथक नाराजगी ने पार्टी को बैकफुट पर ला दिया। कोहली की गिरफ्तारी और एसजीपीसी पर 7.20 करोड़ रुपये की देनदारी ने पार्टी की मुश्किलें बढ़ाईं। विपक्षी दलों ने इसे भ्रष्टाचार और संरक्षण की राजनीति से जोड़ कर चुनौती बढ़ा दी है।
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संगठनात्मक संकट

अकाली दल अंदरूनी लड़ाई से जूझ रहा है। वरिष्ठ नेताओं जैसे बीबी जागीर कौर, गुरप्रताप वडाला, सुरजीत सिंह रखड़ा और पूर्व एसजीपीसी प्रधान गोबिंद सिंह लोंगोवाल ने पार्टी नेतृत्व को खुला विरोध जताया। युवा नेतृत्व का अभाव और ग्रामीण व शहरी क्षेत्रों में घटती पकड़ पार्टी के लिए गंभीर चुनौती बन चुकी है। विशेषज्ञों का कहना है कि अकाली दल का गिरता ग्राफ सिर्फ चुनावी हार नहीं बल्कि पार्टी और उसके पारंपरिक पंथक वोटरों के बीच दूरी का प्रतीक है। अकाली दल को अब न केवल संगठनात्मक मजबूती की जरूरत है, बल्कि पंथक संगत का विश्वास लौटाने के लिए सख्त और पारदर्शी कदम उठाने होंगे।

गिरता वोट प्रतिशत
चुनाव वर्ष
वोट प्रतिशत
2012
34%
2017
25%
2022
18–19%
2024 (लोकसभा) 13%
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