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पेड़ के नीचे भीख मांगने वाले 12 बच्चों से शुरू हुआ शिक्षा देने का कारवां, कॉलोनियों के स्कूलों तक पहुंचा

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संगीता वर्द्धन। - फोटो : CHANDIGARH
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चंडीगढ़। प्रतिकूल परिस्थितियों में समाज की मुख्यधारा से कट गए बच्चों को शिक्षा देकर उन्हें वापस लाना ही मेरे जीवन का लक्ष्य है। यह कहना है सेक्टर-7 निवासी संगीता वर्धन का। संगीता ने वर्ष 2008 में वत्सल छाया एनजीओ के जरिए सेक्टर-8 के लाइट प्वाइंट पर एक पेड़ के नीचे भीख मांगने वाले 12 बच्चों को शिक्षा से जोड़ने की शुुरुआत की थी। लोगों का सहयोग मिला तो वर्ष 2017 तक यह कारवां एक हजार बच्चों तक पहुंच गया। संगीता बताती हैं कि कोठियों में काम करने वालीं कुछ लड़कियों ने जब कॉलेज तक की पढ़ाई पूरी की तो लगा कि मेरा प्रयास सफल हो गया।
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संगीता कहती हैं कि वर्ष 2018 में भी ऐसे बच्चों के लिए काम करने का सिलसिला जारी रहा लेकिन वर्ष 2019 में कोविड और लॉकडाउन के चलते उनके अभियान पर विराम लग गया। हालांकि उन्होंने हार नहीं मानी, उनका प्रयास अब भी जारी है और वह अपने लक्ष्य पर अडिग हैं। वर्तमान में संगीता वर्धन धनास के आरसी टू स्कूल में अपनी संस्था के माध्यम से विशेष बच्चों की शिक्षा-दीक्षा में सहयोग कर रही हैं। साथ ही समाज की मुख्यधारा से अलग हुए बच्चों को शिक्षा से जोड़ने के प्रयास में जुटी हैं।
संगीता बताती हैं कि विभाजन के दौरान उनकी मां पाकिस्तान से जालंधर आई थीं। उनकी पढ़ने की इच्छा थी लेकिन कम उम्र में शादी हो गई और वह लखनऊ चलीं गईं। मन में पढ़ने का दृढ़ संकल्प था तो वहां पढ़ाई शुरू की। कॉलेज तक पढ़ाई करने के बाद लखनऊ में काम करने वाली हर समुदाय की लड़कियों को अपने स्तर पर पढ़ाया। उनका कहना था कि एक लड़की शिक्षित हो गई तो इसका उजियारा दो परिवारों तक पहुंचता है। मां को देखकर ही संगीता को शिक्षा का महत्व समझ आया।
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संगीता ने कहा कि हम तीन बहनें हैं और मैं सबसे छोटी हूं तो इस कारवां को आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी मेरे ऊपर ज्यादा थी। बस इसी उद्देश्य से वत्सल छाया की शुरुआत की। संगीता वर्धन को उनके बेहतर कार्यों के लिए राष्ट्रीय और राज्य स्तर पर पुरस्कार मिल चुके हैं। वर्ष 2018 में उन्हें प्रोटेक्शन ऑफ चाइल्ड राइट्स कमीशन का सदस्य बनाया गया था।
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जनरल रॉड्रिग्स ने सराहा तो सेक्टर-8 के स्कूल में मिली जगह
संगीता ने बताया कि यूटी के तत्कालीन प्रशासक जनरल एसएफ रॉड्रिग्स ने मेरे काम को सराहा तो मुझे शिक्षा विभाग की ओर से सेक्टर-8 के स्कूल में जगह मिल गई। वहां मैंने बच्चों को विशेष प्रशिक्षण देना शुरू किया क्योंकि शिक्षा का मूल्य तभी कोई जान सकता है जब वह मुख्यधारा में जुड़ेगा। वर्ष 2017 तक मेरे प्रयासों से धनास, बापूधाम, इंदिरा कॉलोनी, कॉलोनी नंबर चार तक सरकारी स्कूलों में जगह मिल गई और वहां छोटे बच्चों का प्रशिक्षण शुरू हुआ। मेरे प्रयासों को देखकर एसबीआई की ओर से हमें एक बस मिल गई। उसके बाद कैंबवाला और किशनगढ़ से भी कुछ बच्चों को लाने लगे।
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बच्चों के साथ रहकर पता चला परिवार को जागरूक करना जरूरी
संगीता कहती हैं कि जब बच्चों को हमने प्रशिक्षित करना शुरू किया तो पता चला कि परिजन उन्हें काम करने या छोटे भाई बहनों को देखने के लिए कहते थे। फिर समझ आया कि मां या बहन को समझाएंगे तभी इस समस्या का समाधान निकलेगा। इसके बाद जो बच्चे हमारे पास आते थे उनकी मां और बहनों की काउंसलिंग की गई। तब जाकर संख्या को बरकरार रखने में कामयाबी मिली।
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80 प्रतिशत बच्चों ने की 10वीं, कुछ कॉलेज तक पहुंचे
संगीता ने बताया कि भीख मांगने वाले बच्चों या घरों में काम करने वाले बच्चों को मुख्यधारा में लाकर जीवन को बेहतर बनाना काफी मुश्किल है। उनके पढ़ाए गए बच्चों में से 80 प्रतिशत ने दसवीं तक पढ़ाई की लेकिन फिर उसी काम में लौट गए लेकिन कई लड़कियों ने कॉलेज की पढ़ाई पूरी की और आज अपने पैरों पर खड़ी हैं। उन्होंने बताया कि कोरोना काल में भी जब बच्चों से संपर्क किया तो कुछ लोगों के माता पिता उन्हें छोड़कर गांव चले गए थे। उन्हें राशन से लेकर हर सामग्री घर पर उपलब्ध करवाई गई।
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