फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

जज्बाः खिलौनों को जोड़ते-तोड़ते ये शख्स बन गया रिवर्स इंजीनियर, 12वीं तक थे सामान्य स्टूडेंट

Mon, 23 Mar 2020 12:47 PM IST
खुशबू गोयल अमर उजाला, चंडीगढ़
विज्ञापन
एंटरप्रेन्योर अनीश लौंगिया - फोटो : अमर उजाला
विज्ञापन
नाकामियों से सीखने वाला ही सफल व्यक्ति कहलाता है। उद्योग के लिए विशेष तरह की मशीन डिजाइन करने वाले अनीश लौंगिया के आगे बढ़ने की कहानी कुछ यही सीख देती है। वे रिवर्स इंजीनियरिंग में माहिर हैं। यानी कि किसी मशीन को देखने के बाद उसमें नए बदलाव कर उसे बना देना। दो साल पहले उन्होंने इसी फील्ड में अपना स्टार्टअप शुरू किया।
विज्ञापन


ऐसे बहुत कम स्टार्टअप होते हैं, जो पहले दिन से कमाना शुरू कर दें। अनीश इनोवेशन में नाम और काम दोनों कमा रहे हैं। मैकेनिकल से बीटेक की डिग्री हासिल करने वाले अनीश बचपन से खिलौने को तोड़कर उसे जोड़ देने में माहिर थे। दसवीं क्लास में उन्हें कंप्यूटर से खेलना आ गया था।

घर की लाइटों को डिस्को लाइट में बदलना या नए तरह के लैंप बनाना उनके बाएं हाथ का काम था। जब बारी इंजीनियरिंग की पढ़ाई की आई तो नंबर इतने कम थे कि कोई भी इंजीनियरिंग कालेज उन्हें सीट नहीं देना चाहता था। किसी तरह से उन्हें मैनेजमेंट कोटे की सीट मिली। उनके पेरेंट्स खुश थे, लेकिन अनीश मायूस।
विज्ञापन


कॉलेज में टेक फेस्ट के दौरान उन्हें रोबोट बनाने की जिम्मेदारी दी गई। बस यही उनके लिए टर्निंग प्वाइंट साबित हुआ। रोबोट बनाने के लिए उन्हें किताबों की ओर लौटना पड़ा। पढ़ाई की ऐसी लगन लगी कि बीटेक के बाद एनआईटीटीटीआर चंडीगढ़ से एमटेक की डिग्री हासिल की। फिर नौकरी के बजाए खुद का काम करने की सोची।
विज्ञापन

प्रीमिच्योर नवजात के लिए बनाई वार्मर मशीन

अनीश की क्रिएटिविटी का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि उनके एक क्लाइंट ने उन्हें एक मशीन दिखाई और कहा कि ये मशीन विदेश से आती हैं। काफी महंगी है। यदि भारत में बन जाए तो देशवासियों को काफी फायदा होगा। उन्होंने चैलेंज लिया और मशीन का डिजाइन तैयार कर डाला। मैन्यूफैक्चर ने उसी डिजाइन के आधार पर मशीन तैयार कर दी। मशीन इस समय पीजीआई में इंस्टाल है और प्रीमिच्योर नवजात के काम आ रही है।

स्ट्रेस दूर करने के लिए खेलते हैं गेम्स
अनीश को कंप्यूटर गेम खेलने का अब भी जुनून सवार रहता है। वे अपने तनाव को दूर करने के लिए गेम्स ही खेलते हैं। आसपास के बच्चे भी उनके पास आकर खेलते और सीखते हैं। उनका मानना है कि जब बच्चे गेम खेलते हैं तो वे उनका दिमाग एक्टिव होता है। आजकल जो गेम्स आ रहे हैं, वे भविष्य पर आधारित होते हैं। उनका अनुभव तो यही कहता है कि गेम्स को किसी हद तक खेला जाए तो वह दिमाग पर सकारात्मक असर डालता है।

स्टार्टअप में मेरे दोस्त हार्षित दीवान का भी योगदान हैं। वो मेरा पार्टनर है। अभी तक हम लोग डिजाइन तैयार कर रहे थे। अब हम लोग मशीन बनाने की ओर आगे बढ़ रहे हैं।
- अनीश लौंगिया
और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें