बोर्ड की ओर से सर्वाधिक पराली जलाने वाले चिह्नित किए 464 गांवों में पिछली साल 5453 जगह किसानों द्वारा पराली जलाई गई। जबकि पूरे प्रदेश में पराली जलाने के इससे भी अधिक थे। इन गांवों में अंबाला के 30 गांव शामिल हैं, जहां 143 जगह खेतों में पराली जलाई गई।
इसी तरह भिवानी के 10 गांवों में 23 जगह, फतेहाबाद के 30 गांवों में 1210 जगह, हिसार के 30 गांवों में 189 जगह, झज्जर के 17 गांवों में 31 जगह, जींद के 30 गांवों में 667 जगह, कैथल के 30 गांवों में 666 जगह, करनाल के 30 गांवों में 509 जगह, कुरुक्षेत्र के 30 गांवों में 333 जगह, पलवल के 30 गांवों में 204 जगह, पंचकूला के 12 गांवों में 16 जगह, पानीपत के 25 गांवों में 38 जगह, रोहतक के 24 गांवों में 56 जगह, सिरसा के 30 गांवों में 1121 जगह, सोनीपत के 30 गांवों में 45 जगह, यमुनानगर के 30 गांवों में 96 जगह, चरखीदादरी, फरीदाबाद, महेंद्रगढ़, नूहं व गुरुग्राम के दस गांव में 10 जगह पराली खेतों में ही जलाई गई।
धान कटाई के बाद पराली जलाने की शुरूआत हो चुकी है। 2018 से 2019 की तुलना करें, तो अभी तक पराली जलाने के मामले गत वर्ष की तुलना में कम है। 29 अक्टूबर 2018 तक हरियाणा में 4310 केस पराली जलाने के सामने आ चुके हैं। जबकि इस साल 29 अक्टूबर 2019 पराली जलाने के 3978 केस ही अभी तक रिकार्ड किए गए हैं। यानी अभी तक 332 केस कम है।
अभी तक सामने आए केसों में सबसे ज्यादा कैथल में 864 जगह पराली किसानों ने खेतों में ही जलाई है। जबकि अंबाला में 208 जगह, फतेहाबाद में 490 जगह, करनाल में 843 जगह, कुरुक्षेत्र में 657 जगह, जींद में 199 जगह, पलवल में 185 जगह, सिरसा में 166 जगह और यमुनानगर में 175 पराली जलाने की घटनाएं सामने आ चुकी है।
किसानों को खेतों में पराली न जलाने के लिए जागरूक किया जा रहा है। जबकि कृषि विभाग पराली प्रबंधन के गुर भी सिखा रहा है। खासकर फतेहाबाद और सिरसा में किसान सबसे ज्यादा पराली जलाते हैं। जिलावार ऐसे गांव भी चिह्नित किए हैं, जहां सबसे ज्यादा पराली खेतों में ही जलाई जा रही है। जिला उपायुक्तों पर इन गांवों पर भी फोकस रखने को कहा गया है। दूसरा, दिवाली की वजह से भी प्रदूषण का गुब्बार फिजां में बना हुआ था, जोकि अब कम हो रहा है। - एस. नारायणन, सदस्य सचिव, हरियाणा पोल्यूशन कंट्रोल बोर्ड