कृत्रिम पैर लगवाने पहुंचे तो वजन था महज 28 किलो
डीपी सिंह ने बताया कि करीब एक महीने तक न जाने कितनी सर्जरियां हुईं। शहर का कोई हिस्सा नहीं बचा, जहां चोट न लगी हो। फिर भी 38 से 40 दिनों बाद वह सहारे से खड़े होने लगे। इस बीच कृत्रिम पैर के लिए पुणे में प्रोसेस शुरू कर दिया गया था। वह वहां ट्रेन से पहुंचे। डॉक्टर भी हैरान थे कि 28 किलो के वजन के साथ वह ट्रेन में इतना लंबा सफर करके कैसे पहुंचे। फिर पैर लगा। काफी समय उन्हें इसकी आदत बनाने में लगा। फिर सेना में 2007 तक काम किया। कहा कि उन्हें दूसरी लहर में कोविड भी हुआ, जिसने काफी नुकसान पहुंचाया है। नर्वस सिस्टम पर भी असर पड़ा है।
100 फीसदी दिव्यांग, फिर भी अंगदान करने की ली है शपथ
डीपी सिंह ने बताया कि वह 2007 में सेना से बाहर आए और 2009 में दौड़ना शुरू किया। 2011 में वे देश के पहले ‘ब्लेड रनर’ बने। अब तक वे 26 से ज्यादा हाफ मैराथन में भाग ले चुके हैं। 42वें जन्मदिन को यादगार बनाने के लिए उन्होंने 42 किलोमीटर की फुल मैराथन में भाग लिया था। वे सांगला, लेह और कारगिल में हुई मैराथन में भी दौड़ चुके हैं। इसके अलावा चार बार लिम्का बुक ऑफ रिकॉर्ड्स, 2018 में भारत सरकार ने उन्हें राष्ट्रीय प्रेरक व्यक्तित्व का सम्मान दिया है। सौ फीसदी दिव्यांग घोषित किए जाने के बावजूद उन्होंने अंगदान और बोन मैरो दान का संकल्प ले रखा है। मेजर सिंह ने नासिक में पहली बार सफल स्काई डाइविंग की। ऐसा करने वाले वे एशिया के पहले दिव्यांग हैं।