पीजीआई प्रशासन ने एवेस्टिन हादसे की पूरी रिपोर्ट शनिवार को ड्रग कंट्रोलर जनरल ऑफ इंडिया को भेज दी। रिपोर्ट के साथ मरीजों की स्थिति, इलाज की जानकारी, दवा खरीदारी के प्रमाण, कुमार एंड कंपनी के बिल को भी शामिल किया गया है। रिपोर्ट में इस बात का भी उल्लेख किया गया है कि पीजीआई एवेस्टिन को बल्क में खरीदता था। अचानक स्टॉक खत्म होने पर उसे स्थानीय केमिस्ट शॉप से खरीदनी पड़ी। एवेस्टिन (बेवासिजुमेब) के बैच नंबर बी7034बी02 की दो वायल कुमार एंड कंपनी से खरीदनी पड़ी, इसमें से एक वायल में गड़बड़ी मिली है। दूसरे वायल का इस्तेमाल नहीं किया गया है।
अब ड्रग कंट्रोलर जनरल ऑफ इंडिया इस मामले में कोई फैसला ले सकता है। दूसरी तरफ एवेस्टिन निर्माता कंपनी रोशे ने बयान जारी कर कहा है कि वह इस पूरे मामले की जांच में सहयोग करने को तैयार है।
19 मरीजों की सर्जरी की जा चुकी है
पीजीआई ने बताया है कि 30 में से 27 मरीजों का इलाज चल रहा है। उन्हें सर्वोत्तम इलाज देने की कोशिश की जा रही है। इनमें से 19 मरीजों की सर्जरी शनिवार तक हो चुकी है। इंफेक्शन रुक गया है। अब रोशनी वापस लाने की कोशिश जारी है। आई सेंटर के डॉक्टरों के मुताबिक, मरीजों को पांच दिन तक इंट्रावेनस एंटीबायोटिक ट्रीटमेंट दिया जा रहा है। इसके बाद मरीजों को डिस्चार्ज कर दिया जाएगा। कुछ दिन बाद उनकी नजर ठीक वैसी हो जाएगी, जैसे पहले थी। इन मरीजों की जांच हरघंटे की जा रही है। मरीजों को गहन निगरानी में रखा गया है। कोशिश की जा रही है कि किसी भी मरीज की आंखों में कोई नुकसान न हो।
एवेस्टिन निर्माता कंपनी ने फिर दिया बयान, ऐसे पनपता है बैक्टीरिया
एवेस्टिन की निर्माता कंपनी रोशे ने फिर से बयान देकर बताया है कि दवा में बैक्टीरिया कहां पनप सकता है। कंपनी के मुताबिक, डॉक्टर एक वायल के कई डोज बनाते हैं। यह प्रक्रिया काफी घातक है और इसमें बैक्टीरिया पनपने की पूरी संभावना रहती है। इस प्रक्रिया का इस्तेमाल करने से विश्व के कई हिस्सों में आंखों में इंफेक्शन के मामले सामने आ चुके हैं। आगे इस तरह की घटना न हो, इसके लिए समय-समय पर चेतावनी और आर्टिकल पब्लिश होते रहे हैं। एवेस्टिन के इस्तेमाल की अनुमति सिर्फ कैंसर थैरेपी के लिए मिली है। आंखों में डालने के लिए इसकी अनुमति नहीं दी गई है। कंपनी ने विश्वास दिलाया है कि वे किसी भी जांच में सहयोग करने के लिए तैयार हैं।
दवा का इस्तेमाल रुका तो गरीबों पर पड़ेगी मार
एवेस्टिन के पक्ष में सभी आई सर्जन आ गए हैं। उनका कहना है कि यदि इस दवा पर रोक लगी तो काफी मरीज आंखों की रोशनी गंवा देंगे। डायबिटीक होने के बाद जिन लोगों की आंखों की रोशनी चली जाती है तो उन मरीजों के लिए यह दवा किसी रामबाण से कम नहीं है। सबसे बड़ी बात यह है कि इसकी एक डोज मरीजों को मात्र 1500 रुपये में पड़ती है। यह इंजेक्शन एक मरीज को 10 भी लगते हैं, 20 भी लग सकते हैं। कई मरीज तो ऐसे हैं, जिन्हें 100 इंजेक्शन लगते हैं। यदि मरीज को एवेस्टिन की जगह ल्यूसेंटिस लगता तो कई का घर बिक जाता और कई इसे खरीद नहीं पाते। नतीजतन आंखों की रोशनी गंवा बैठते। ल्यूसेंटिस की एक डोज की कीमत 23 हजार रुपये है। मरीजों को सिर्फ एक डोज नहीं लगता बल्कि दस से लेकर 100 तक इंजेक्शन लगाए जा सकते हैं। ऐसे में मरीजों के लिए मुश्किल हो जाएगी।
मरीज के परिजनों ने कहा- पीजीआई पर पूरा भरोसा
पीजीआई में दाखिल मरीजों के परिजनों ने कहा है कि उन्हें संस्थान के इलाज पर पूरा भरोसा है। वे पहले भी पीजीआई से इलाज कराते रहे हैं। मनाली के मानचंद की आंखों में भी दिक्कत आई थी। वे एडवांस आई सेंटर में एडमिट हैं। उनकी पत्नी विमला ने बताया कि पीजीआई के डॉक्टरों पर हमें कोई शक नहीं है। उनकी तरफ से इलाज में कोई कोताही नहीं हो सकती। उनके रिश्तेदार पीजीआई आए थे और वे अब पूरी तरह से ठीक हैं। उम्मीद है कि पीजीआई मेरे पति की आंख को ठीक कर देगा। ऐसा ही कुछ खरड़ के हरीश शर्मा का कहना है। उनका कहना है कि वे खुद 50 से ज्यादा मरीजों को पीजीआई के आई सेंटर में दिखवा चुके हैं। उन्हें कभी परेशानी नहीं आई है। सभी ठीक हैं। हमें पीजीआई के इलाज पर पूरा विश्वास है।
चंडीगढ़ पीजीआई के प्रोफेसर एमआर डोगरा का कहना है कि मरीज तेजी से रिकवर कर रहे हैं। 19 मरीजों की सर्जरी हो चुकी है। यह घटना एक दुर्भाग्यपूर्ण है। एवेस्टिन दवा का इस्तेमाल नहीं रोका जाएगा। यदि यह रुकती है तो मैं यही कहूंगा कि गरीबों पर मार पड़ेगी। हम इसका इस्तेमाल वर्ष 2007 से कर रहे हैं। इस दवा के इस्तेमाल से कई मरीजों की आंखों की रोशनी वापस ला चुके हैं।