ओलंपिक मेडलिस्ट पहलवान साक्षी मलिक के कोच को लेकर शुरू हुआ विवाद थमने का नाम नहीं ले रहा है।
मामले में अब सरकार के सामने भी परेशानी खड़ी हो सकती है। दिल्ली के एक युवक ने आरटीआई के तहत जवाब मांगा है कि आखिर किस आधार पर सरकार ने मनदीप को साक्षी का कोच मान लिया? क्या साक्षी के कहने से मनदीप को उसका कोच माना गया? जबकि साक्षी के मनदीप के अलावा भी दो कोच रहे हैं।
रियो ओलंपिक में कांस्य पदक जीतने वाली साक्षी मलिक ने कुश्ती की शुरूआत साल 2004 में सर छोटूराम स्टेडियम से की। उस समय वहां के कोच ईश्वर दहिया थे।
उन्होंने साक्षी को कुश्ती के शुरूआती दांवपेंच सिखाए। दहिया छह साल तक साक्षी के कोच रहे। उनके बाद वर्ष 2011 में सर छोटूराम स्टेडियम में सरकार ने कुश्ती की एकेडमी शुरू की तो झज्जर के जिला खेल अधिकारी व कई महीने तक रोहतक के कार्यवाहक खेल अधिकारी रहे राजबीर सिंह बतौर कुश्ती कोच तैनात रहे।
राजबीर सिंह ने साक्षी को पहलवानी का प्रशिक्षण दिया
साक्षी मलिक
- फोटो : PTI
साल 2011-2015 की शुरूआत तक राजबीर सिंह ने साक्षी को पहलवानी का प्रशिक्षण दिया।
इस बीच साक्षी ने कामनवेल्थ में मेडल जीता। इसके बाद साल 2015 से अब तक मनदीप साक्षी के कोच हैं। पहले कोच रहे ईश्वर दहिया विभाग से सेवानिवृत्त हो चुके हैं तो राजबीर सिंह और मनदीप अब भी कार्यरत हैं। राजबीर सिंह चार साल तक साक्षी के कोच रहे और उनको सरकार की ओर से कुछ नहीं दिया गया। जबकि मनदीप को डेढ़ साल तक कोच रहने पर नकद इनाम राशि के अलावा प्रमोशन दिया गया है।
सरकार ने साक्षी का कोच किस मानक के आधार पर तय किया है, इस पर दिल्ली की इंदिरा विकास कालोनी में रहने वाले दीपक कुमार ने विभाग में आरटीआई लगाई है।
आरटीआई में पूछा है कि मनदीप कितने समय तक साक्षी के कोच रहे हैं और सरकार ने किस आधार पर उनको साक्षी का कोच माना? क्या साक्षी के कहने पर ही उनका कोच मान लिया गया? इस तरह के सवालों के जवाब अब सरकार को देने हैं।
क्या कहते हैं कोच
साक्षी मलिक के कोच ईश्वर सिंह दहिया
- फोटो : अमर उजाला
जिस समय सर छोटूराम स्टेडियम में कुश्ती एकेडमी शुरू की गई, उस समय साल 2011 में मुझे कोच नियुक्त किया गया। मैंने ही साक्षी को कुश्ती के दांवपेंच की प्रैक्टिस कराई। मेरे समय में उसने कामनवेल्थ में मेडल जीता। ओलंपिक की तैयारी भी मैंने कराई, लेकिन मेरी मेहनत को नजरअंदाज किया जा रहा है।
- राजबीर सिंह, डीएसओ
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साक्षी सबसे पहले जब स्टेडियम में आई थी तो मैंने उसे कुश्ती के शुरूआती गुर सिखाए। जब बेटियों को अखाड़े में भेजने में परिवार वाले डरते थे तो मैंने ही स्टेडियम में लड़कियों को कुश्ती सिखाने की शुरूआत की। यही कारण है कि साक्षी समेत काफी बेटियां कुश्ती में आगे आकर अच्छा प्रदर्शन कर रही हैं।
- ईश्वर दहिया, पूर्व डीएसओ