भारतीय महिला खिलाड़ियों में कमर दर्द की समस्या सबसे ज्यादा है जबकि विदेशी महिला खिलाड़ी कलाई और हाथ की चोट सबसे ज्यादा झेल रहीं हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि भारतीय खिलाड़ियों पर खेल का दबाव ज्यादा है। उन्हें क्रिकेट से जुड़े तकनीकी पक्ष की बेहतर जानकारी नहीं है। इसके कारण वह अनजाने में किसी न किसी दबाव के कारण कमर दर्द की शिकार हो रही हैं जबकि विदेशी खिलाड़ी फिल्डिंग और बॉलिंग के दौरान कलाई और हाथ के फ्रैक्चर से जूझ रहीं हैं।
यूके की महिला क्रिकेट टीम से जुड़ी फिजियोथेरेपिस्ट सोनी बंसल ने इस तथ्य को अपने शोध से सत्यापित किया है। चेन्नई के बॉलिंग तकनीक के विश्लेषणकर्ता के साथ मिलकर किए गए शोध में महिला खिलाड़ियों की विभिन्न चोटों पर फोकस किया गया है।
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मददगार साबित हो सकते हैं चोट संबंधी शोध
सेक्टर-17 स्थित एक निजी होटल में आयोजित वर्ल्ड कांग्रेस ऑफ साइंस एंड मेडिसिन इन क्रिकेट में सोनी बंसल ने इस शोध को प्रस्तुत किया। सोनी ने बताया कि पहले महिला खिलाड़ियों पर कोई बात ही नहीं होती थी लेकिन अब वक्त तेजी से बदल रहा है।
महिला क्रिकेट को बढ़ावा देने के लिए हर संभव प्रयास किए जा रहे हैं। ऐसे में चोट संबंधी शोध बेहद मददगार साबित हो सकते हैं इसलिए पीजीआई के प्रो. मंदीप ढिल्लों के सहयोग से इस पर काम शुरू किया। इसमें इंग्लैंड की महिला खिलाड़ियों का 10 साल का रिकॉर्ड था लेकिन भारत का रिकॉर्ड बेहद कमजोर था। ऐसे उसे मजबूत करने के लिए महिला खिलाड़ियों को फॉर्म दिया और उसे भरवाकर रिकॉर्ड तैयार किया। यह शोध दो साल के दौरान किया गया।
चोट को नजरअंदाज करतीं रहीं भारतीय खिलाड़ी
सोनी ने बताया कि शोध के दौरान खिलाड़ियों के रिकॉर्ड से पता चला कि भारतीय खिलाड़ी अपनी चोट को नजरअंदाज कर रहीं हैं। उनके द्वारा फिल्ड में चोट को लेकर अपील नहीं की जा रही जबकि विदेशी खिलाड़ी चोट की अपील को लेकर काफी मुखर हैं। विदेशी महिला खिलाड़ी छोटी-छोटी चोट को भी दर्ज करातीं हैं। इसके आधार पर डाटा का आकलन कर बचाव के उपाय पर फोकस करना आसान हो रहा है जबकि भारत में इसकी कमी है इसलिए भारत में तकनीकी बायोमैकेनिक पर ज्यादा काम करने की जरूरत है।