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PU Research: शोध में खुलासा-चंडीगढ़ में हो रहा मानवाधिकारों का हनन, फुटपाथ पर जीवन काट रहे गरीब

Fri, 19 Apr 2024 12:17 PM IST
निवेदिता वर्मा प्रियंका ठाकुर, अमर उजाला, चंडीगढ़

सार

ह्यूमन राइट्स इशूज ऑफ अर्बन होमलेस इन इंडिया: स्टडी ऑफ चंडीगढ़ शीर्षक से प्रकाशित पेपर में मोनिका ने बताया कि कैसे भारत की विकासशील अर्थथ्यवस्था के समक्ष लोगों को पर्याप्त आवास का अधिकार दिलाना चुनौती बन गया है। शोध में बेघर होने का मुख्य कारण बेरोजगारी और गरीबी आया। सैंपल सर्वे में 75 प्रतिशत प्रतिभागी वर्किंग क्लास अर्थात 19-50 साल की उम्र के बीच के लोग हैं जिसमें अधिकतर लोगों का पैतृक स्थान बिहार और उत्तर प्रदेश है।
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पीयू की सीनियर रिसर्च फेलो मोनिका जसवाल - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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रोटी, कपड़ा, मकान - व्यक्ति की मूल जरूरतों में शामिल है जिससे वह अपने जीने के अधिकार का प्रयोग कर पाता है। लेकिन शहरों में विकास होने के साथ लगातार गरीब लोगों की आशियाना पाने की क्षमता कम हो रही है जिसका नतीजा है सड़क, शोरूम, फुटपाथ पर रहते लोग।

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चंडीगढ़ में बिना किसी सुरक्षा, साफ पानी, सेनिटेशन की व्यवस्था के खुले में रह रहे बेघर लोगों पर पीयू की सीनियर रिसर्च फेलो मोनिका जसवाल ने शोध किया और पाया कि किस प्रकार उनके मानव अधिकारों का हनन हो रहा है। सेंटर फॉर ह्यूमन राइट्स एंड ड्यूटीज से प्रो. नमिता गुप्ता के साथ मिलकर मोनिका ने 2019 में शहर के सेक्टर 12, 15, 16, 17, 20, 21, 22, 34, 35 सेक्टरों के बाजारों, मंदिरों, बस स्टैंड आदि सार्वजनिक स्थानों पर खुले में रह रहे 250 लोगों का सर्वे कर अध्ययन किया। 

48 प्रतिशत ने बेरोजगारी और 32 प्रतिशत गरीबी के कारण अपने पैतृक स्थान से पलायन किया। ग्रामीण क्षेत्रों के मुकाबले शहरों में बेघर लोगों की संख्या सेंसस के अनुसार तेजी से बढ़ी है। 2011 के सेंसस के अनुसार चंडीगढ़ में 4139 बेघर लोग हैं जिनमें 3737 पुरुष और 302 महिलाएं हैं। मोनिका ने बताया बेघर होना कभी किसी की च्वाइस नहीं होती बल्कि उनकी आर्थिक मजबूरी है।
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स्टडी के तहत बेघर लोगों की स्थिति जानने के लिए अमर उजाला ने शहर के विभिन्न सार्वजनिक स्थानों पर जाकर बेघर लोगों से बात की और उनके खुले में रहने के बारे में जाना।

केस स्टडी 1.
सेक्टर आठ बाजार में खुले में सोते, खाना बनाते राम (नाम बदला हुआ) ने बताया चंडीगढ़ में गांव से 300 रुपये ज्यादा दिहाड़ी मिलती है लेकिन कमाई इतनी भी नहीं होती कि कमरा लेकर रह सकें। अगर कमरे में रहने लगेंगे तो परिवार के लिए पैसे कहां से बचेंगे।

केस स्टडी 2.
रविवार के दिन मध्य मार्ग पर एक बाजार में सुबह साढ़े आठ बजे खाना बनाते मजदूर ने बताया वह 1990 के दशक में चंडीगढ़ में रह रहे हैं। पहले ऑटोरिक्शा चलाते थे तो कमरा लिया था लेकिन धीरे-धीरे ऊबर, ओला आए और रिक्शे से कमाई कम हुई और वह कमरा छोड़ कर खुले में रहने लगे।

केस स्टडी 3.
सेक्टर नौ के शोरूम के नीचे रहते मजदूर ने बताया कि गर्मियों में खुले में रहने में अधिक दिक्कत नहीं होती। लेकिन जनवरी में इस बार ज्यादा ठंड होने से मजबूरन अपने गांव वापस जाना पड़ा। यूपी, बिहार से आए एक गांव के लोग साथ में रहते हैं जिसमें सबसे जवान लड़के की उम्र 15-16 साल होगी।

स्टडी में पाया इन मानव अधिकारों का हो रहा हनन 
पर्याप्त आवास का अधिकार -
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पर्याप्त आवास को मानव का महत्वपूर्ण अधिकार माना गया है। 250 में से 145 लोग बाजार में, 80 मंदिर में और 25 फुटपाथ पर रह रहे हैं। जहां तक मानवीय गरिमा और सुरक्षा की बात उसकी इन्हें यहां रहने पर कोई गारंटी नहीं मिलती।

स्वास्थ्य का अधिकार - अधिकतर रेस्पोंडेंट ने बताया कि उन्हें अच्छी नींद नहीं आ पाती और अकेलापन भी महसूस होता है जो उनके काम करने की क्षमता को भी प्रभावित करता है। साफ पानी और स्वच्छ सेनिटेशन न मिल पाने से कई बार बेघर लोग डायरिया, बुखार, मलेरिया जैसी बीमारियों से प्रभावित होते हैं। घर न होने और कमजोर मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य का सीधा लिंक देखा गया।

आजीविका का अधिकार - मजदूर महीने का औसतन 2000-4000 रुपये काम पाते हैं और ऐसे में उनके लिए कमरा ले पाना मुमकिन नहीं। इनमें गुब्बारे बेचने वाले, रिक्शा चलाने वाले, माली, मजदूर आदि शामिल हैं। स्किल्ड लेबर न होने से अधिकतर लोग मजदूरी पर निर्भर करते हैं।

निजता का अधिकार -महिलाओं ने बताया खुले में रहने से उनके निजी जीवन पर प्रभाव पड़ा है। अधिकतर लोगों को खुले में नहाना, सोना आदि सब काम करना पड़ता है। कुछ ने बताया कि निजता न होने से उनका निजी जीवन (सेक्सुअल लाइफ) प्रभावित हुआ है।
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अन्य अधिकार - खाने का अधिकार, सूचना का अधिकार, क्रूर, अमानवीय और डिग्रेडिंग व्यवहार मुक्त जीवन जीने का अधिकार आदि।

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