फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

राहत इंदौरी ने कहा, अब फिल्मी गानों से 'शब्द' गायब हो चुके हैं...बचा सिर्फ ढिंक चिका, ढिंक चिका

Wed, 12 Sep 2018 09:52 AM IST
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चंडीगढ़
विज्ञापन
राहत इंदौरी
विज्ञापन

हिंदी फिल्मों के गीतों से ‘शब्द’ गायब हो चुके हैं। यही वजह है कि शायर और शायरी फिल्म इंडस्ट्री से दूर होती जा रही है। अब फिल्मों में ढिंक चिका, ढिंक चिका... जैसे गानों की डिमांड है। ऐसे ही गाने लिखे जा रहे हैं और गाए जा रहे हैं। अब इसमें शायर का क्या काम। ऐसे गाने तो कोई भी लिख देगा। यह कहना है मशहूर शायर राहत इंदौरी का।

विज्ञापन


वह मंगलवार को चंडीगढ़ में इबारत लेखक कला मंच की ओर से आयोजित ऑल इंडिया मुशायरा ‘एक शाम अमन के नाम’ में शिरकत करने आए थे। इस दौरान उन्होंने अमर उजाला से खास बातचीत में गीत, गजल और मुशायरे पर अपनी बेबाक राय रखी। 
 
एक सवाल के जवाब में राहत इंदौरी ने कहा कि कुछ समय पहले तक फिल्मों में गीतों के बोल और शब्दों का डायरेक्टर विशेष तौर पर ध्यान रखते थे। इसके लिए वह शायरों और शायरी को तवज्जो देते थे। लेकिन अब ऐसा नहीं रह गया है। अब ज्यादातर गाने ऐसे लिखे और गाए जा रहे हैं, जिनमें भाव और शब्दों का अभाव नजर आ रहा है। हां, लाउड म्यूजिक जरूर होता है गानों में। पहले के गीत आज भी लोगों की जुबान पर हैं, या यूं कहें कि याद हैं।
विज्ञापन


 मगर आजकल के गाने इधर से आते हैं, उधर चले जाते हैं, कोई याद नहीं रखता। यही फर्क है शब्दों की गहराई ओर भाव का। ऐसा नहीं है कि अच्छे गीतों को सुनने वाली ऑडियंस नहीं है, ऑडियंस तो वही देखेगी जो आप दिखाएंगे। मैंने 40 से ज्यादा फिल्मों में गीत लिखे। कई गाने हिट रहे, जो आज भी लोगों की जुबान पर हैं। अच्छे गीत हमेशा याद रखे और गुनगुनाए जाते हैं। आज भी कई गीतकार अच्छा लिख रहे हैं, जिन्हें लोग पसंद भी कर रहे हैं। उस समय लेखक, गीतकार और डायरेक्टर दोस्त की तरह काम करते थे। काम करने का स्टाइल ही अलग था। अब सबकुछ प्रोफेशनल हो चुका है

विज्ञापन

लोगों ने शायरी को तुकबंदी बना दिया है

राहत इंदौरी
राहत इंदौरी ने बताया कि वह फिल्म डायरेक्टर विधु विनोद चोपड़ा की फिल्म के लिए गीत लिख रहे हैं। वह फिल्म कश्मीरी पंडितों पर आधारित है। फिल्म का ज्यादातर हिस्सा शायरी में ही है। वैसे भी मैंने फिल्म मुन्नाभाई एमबीबीएस और मिशन कश्मीर के लिए जो गीत लिखे उनको लोगों ने काफी प्यार दिया। फिल्म ‘इश्क’ का गीत ‘नींद चुराई तूने मेरी ओ सनम...’ मुझे काफी पसंद है।

एक सवाल के जवाब में राहत इंदौरी ने कहा कि ऐसा नहीं है कि वह मुंबई छोड़कर चले गए हैं, यदि अच्छा काम मिलेगा, तो जरूर जाऊंगा। उन्होंने कहा कि अब मुशायरों में कई बदलाव आ चुके हैं। अगर आज देश में 60 मुशायरे होते हैं तो उसमें से 40 ऐसे होते हैं, जिनमें दोयम दर्जे के शायर होते हैं। अब कहीं-कहीं पर शायरी तुकबंदी बन चुकी है तो कहीं पर गद्य। अब बाजारवाद का दौर है और इस दौर में मुशायरों का भी बाजारीकरण हो रहा है।

पहले हर जुबान में होती थी शायरी
जुबान की बात करें तो पहले यह पैदा होती है, जवान होती है और फिर बूढ़ी होने के बाद खत्म हो जाती है। किसी जुबान को आप कोई दर्जा नहीं दे सकते हैं। अब जुबान के हिसाब से शायरी नहीं होती है, पहले जुबान के हिसाब से ही शायरी होती थी। गालिब जैसे शायर भी कहते थे कि यदि पढ़ना है तो उनकी फारसी शायरी पढ़े। भाषा तो सिर्फ उर्दू ही नहीं। अब सभी भाषाओं का हाल एक जैसा हो चुका है। हमारी एक और समस्या है कि भावनाओं को प्रकट करने की आजादी कुछ ज्यादा हो चुकी है।
और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें