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यादें 2015: पंजाब में साल भर छिड़ा रहा सियासी घमासान

Thu, 31 Dec 2015 09:41 AM IST
अनिल भारद्वाज/अमर उजाला, चंडीगढ़
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पंजाब के लिए वर्ष 2015 भारी सियासी उठा-पटक का गवाह बना। प्रदेश में वर्ष भर पंथक मुद्दे छाए रहे, जिन पर सियासी घमासान चलता रहा। इतना ही नहीं गन्ने और कपास पर भी खूब राजनीति हुई। सियासी हलकों में जहां एक ओर अकाली-भाजपा के रिश्तों में खटास उभरती, तो कभी कांग्रेसी नेताओं के बीच भीतरघात के हालात सामने आए।
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नतीजतन पीपीसीसी अध्यक्ष पद पर प्रताप सिंह बाजवा की जगह कैप्टन अमरिंदर सिंह काबिज हुए। वहीं श्री गुरुग्रंथ साहिब की बेअदबी की घटनाओं के बीच उत्पन्न तनावपूर्ण हालात के दौरान सरकार को आलोचनाओं का सामना करना पड़ा। पंथक मुद्दों को लेकर कुछ संगठनों की ओर से ‘सरबत खालसा’ के आयोजन के बाद शिअद ने प्रदेश में छह सद्भावना रैलियों के जरिए शक्ति प्रदर्शन किया। वहीं कैप्टन अमरिंदर ने अपनी ताजपोशी पर बठिंडा में रैली कर ताकत दिखाई।

इस तरह एक के बाद एक कई रैलियों से प्रदेश में 2017 विधानसभा चुनाव से करीब सवा साल पहले ही चुनाव जैसा माहौल दिखा। दूसरी ओर लोस चुनाव में चौकाने वाले प्रदर्शन से सूबे की सियासत में आप की पैठ भी मजबूत हुई। हालांकि पार्टी के नेताओं में कलह भी सामने आई और आप सांसद हरिंदर सिंह खालसा तथा धर्मवीर गांधी का पार्टी से निलंबन सुर्खियों में रहा।
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विकास कार्यों में भेदभाव के आरोप पर उभरी गठबंधन में दरार
साल के शुरुआत में नगर निकाय चुनाव में कैबिनेट मंत्री अनिल जोशी के भाई पर हुए हमले और मुख्य संसदीय सचिव नवजोत कौर सिद्धू की ओर से अपने क्षेत्र में विकास कार्य न होने का आरोप लगाते हुए धरना देने से अकाली-भाजपा गठबंधन में दरार उभरती। वहीं, प्रदेश भाजपा अध्यक्ष कमल शर्मा के कुछ नजदीकियों के ड्रग्स से जुड़े एक मामले में नाम उछलने से उनके पद पर तलवार लटकती नजर आई। हालांकि बाद में यह खतरा टल गया। अब प्रदेश भाजपा अध्यक्ष पद के चुनाव की प्रक्रिया जारी है।

कैप्टन को कमान से दिलचस्प हुआ खेल

पंजाब प्रदेश कांग्रेस की कमान कैप्टन अमरिंदर सिंह को मिलते ही प्रदेश में सियासी खेल काफी दिलचस्प हो गया। उनके अध्यक्ष बनते ही जहां शिअद ने कांग्रेस के प्रति अपना रवैया और आक्रामक किया, वहीं बठिंडा रैली में उमड़ी भीड़ ने पंजाब में सियासी गर्मी बढ़ने का संकेत दिया।

कैप्टन ने बादल परिवार के गढ़ बठिंडा को अपने रैली स्थल के रूप में चुनकर शिअद के साथ आक्रामक तरीके से लड़ाई लड़ने का एक तरीके से ऐलान किया। वहीं, कांग्रेस विधायक दल के नेता के रूप में सुनील जाखड़ की जगह चरनजीत सिंह चन्नी की नियुक्ति कर पार्टी हाईकमान ने सभी वर्गों को खुश करने की कोशिश की।

बेअदबी की घटनाओं के बाद ‘सरबत खालसा’ ने बदला रुख
प्रदेश में श्री गुरुग्रंथ साहिब की बेअदबी की घटनाओं के विरोध में कुछ सिख संगठनों की ओर से अमृतसर में आयोजित किए गए ‘सरबत खालसा’ ने प्रदेश की सियासत का रुख ही मोड़ दिया।

इस आयोजन में एक बार फिर खालिस्तान की मांग और पूर्व मुख्यमंत्री बेअंत सिंह की हत्या के मामले में सजा का सामना कर रहे जगतार सिंह हवारा को श्री अकाल तख्त साहिब का जत्थेदार घोषित किए जाने की बात सामने आई।

इससे प्रदेश सरकार की चिंता बढ़ी। केंद्र सरकार तक ने इस आयोजन की रिपोर्ट ली। खुद केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल से बात की और फिर ‘सरबत खालसा’ के आयोजकों के खिलाफ देशद्रोह के मामले दर्ज हुए।

शिअद को मिला शक्ति प्रदर्शन का मौका

‘सरबत खालसा’ से उपजे माहौल के बीच शिअद ने प्रदेश के अलग-अलग हिस्सों में छह सद्भावना रैलियां कीं। एक तरह से इस आयोजन ने ही शिअद को शक्ति प्रदर्शन का मौका दिया। इन रैलियों के दौरान पार्टी ने ‘सरबत खालसा’ में उठे खालिस्तान के मुद्दे पर कट्टरपंथियों व कांग्रेस को आड़े हाथों लेते हुए, इसका सियासी लाभ लेने की पूरी कोशिश की।

शिअद को अपने कार्यकर्ताओं को सक्रिय करने का मिला। वहीं, भाजपा की इन रैलियों में शिरकत ने दोनों दलों के बीच अलग-अलग मौकों पर आई तल्खी के कुछ कम होने का संकेत भी दिया। वहीं, कैप्टन अमरिंदर के बठिंडा में रैली करने के दिन ही उनके गृह क्षेत्र पटियाला में जनसभा का आयोजन करके शिअद ने उनकी सियासी चुनौती स्वीकार की।

फूट के बावजूद आप की चुनौती
बेशक पंजाब इकाई के नए गठन के बाद आप में फूट उभरी, फिर भी शिअद और कांग्रेस दोनों ही इसे मजबूत मानकर चल रहे हैं। आप पंजाब की मौजूदा लीडरशिप से अलग राय रखने वाले अपने सांसदों पटियाला से डॉ. धर्मवीर गांधी और फतेहगढ़ साहिब से हरिंदर सिंह खालसा को निलंबित करके पार्टी ने फूट खत्म करने की कोशिश की।

फिर भी बहुत से आप वालंटियरों के अपने साथ आने का दावा न केवल यह सांसद कर रहे हैं, बल्कि स्वराज अभियान प्रमुख योगेंद्र यादव विधानसभा चुनाव के लिए डॉ. गांधी व खालसा की अगुवाई में अलग विकल्प तैयार करने की लगातार कोशिश कर रहे हैं।

बीते एक हफ्ते के दौरान दो कांग्रेसी नेताओं सुखपाल सिंह खैहरा और जगतार सिंह राजला का आप ज्वाइन करना इसकी बड़ी उपलब्धि रहा। इस सबके बीच शिअद और कांग्रेस दोनों आगामी चुनाव में अपना मुकाबला आप से होने की बात कह रहे हैं।
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सफेद मक्खी पर भी खूब छिड़ा घमासान

गन्ने की अदायगी में देरी और सफेद मक्खी के हमले से तबाह हुई कपास की फसल पर कांग्रेसी हमलों से प्रदेश में मौजूदा सियासी गर्मी की शुरुआत हुई। कैप्टन अमरिंदर और सुनील जाखड़ की अगुवाई में कांग्रेसियों ने किसानों की गन्ने की अदायगी की मांग को लेकर मुख्यमंत्री निवास पर धरना दिया गया।

धरनों का दौर जारी ही था कि मालवा में सफेद मक्खी के हमले से लाखों हेक्टेयर कपास की तबाही हुई। इस पर खूब सियासत हुई और विधानसभा में भी बहुत हंगामा हुआ। बात अधिकारियों के खिलाफ मामला दर्ज होने और उनकी गिरफ्तारी तक पहुंची। इस मुद्दे सेे विपक्ष को सरकार पर हमले करने का मौका मिला।

इनवेस्टर व सोलर समिट के जरिये गिनाईं उपलब्धियां
सूबे में इनवेस्टर पंजाब और सोलर समिट के जरिए सरकार ने अपनी उपलब्धियां दर्शाईं। सरकार ने बड़े निवेश के एमओयू कर प्रदेश में शांतिपूर्ण माहौल व आधारभूत ढांचे की मजबूती से संबंधित अपनी उपलब्धियां गिनाने की कोशिश की। सरकार ने यह दिखाने की कोशिश की कि प्रदेश में काफी तरक्की हो चुकी है। इतना अच्छा माहौल है कि बड़े-बड़े औद्योगिक घराने यहां निवेश करने के लिए उतावले हैं।

सिख कैदियों की रिहाई को लेकर लंबा प्रदर्शन
देश की विभिन्न जेलों में बंद सिख कैदियों की रिहाई से संबंधित प्रदर्शन भी सालभर चलते रहे। सूरत सिंह अभी तक अनशन पर हैं। इस बीच कुछ दलों ने बड़ी रैलियां भी कीं और पुलिस को जवाब भी देना पड़ा। सरकार ने इस बारे में कमेटी भी बनाई और आतंकवाद के अलग-अलग केसों के संबंध में पंजाब से बाहर की जेलों में बंद दो सिख कैदी प्रदेश में शिफ्ट किए गए।

हादसे और हत्याओं पर भी गरमाई राजनीति
प्रदेश में कुछ हादसे और हत्याकांडों पर भी राजनीति गरम हुई। इसमें बादल के मालिकाना वाले ऑबिट बस में छेड़छाड़ के बाद मां-बेटी को बस से धक्का देने और अबोहर में दलित युवक की हत्या का मामला सुर्खियों में रहा। इस घटनाओं पर छिड़ी सियासत की गूंज संसद तक सुनी गई। 
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