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तरुण चुघ: वार्ड अध्यक्ष से भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव बनने की कहानी, पढ़ें- राजनीतिक सफर

Sun, 27 Sep 2020 02:39 PM IST
ajay kumar अशोक नीर, अमर उजाला, अमृतसर (पंजाब)
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Punjab - फोटो : facebook.com/tarunchughbjp
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भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा की नई टीम में अमृतसर के तरुण चुघ को महासचिव पद की जिम्मेदारी दी गई है। वार्ड अध्यक्ष से लेकर राष्ट्रीय महासचिव तक की चुघ की यात्रा बहुत ही चुनौतीपूर्ण रही है। सात साल से पार्टी के राष्ट्रीय सचिव की भूमिका निभाने वाले चुघ को उत्तर-पूर्व के राज्यों और दिल्ली प्रभारी की जिम्मेदारी सौंपी गई थी। अपनी मेहनत और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह के साथ नजदीकियों का लाभ तरुण को मिलता रहा है।   

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1980 के दशक में भाजपा का झंडा पकड़ कर नमक मंडी की गलियों व बाजारों में पार्टी प्रत्याशियों के लिए घर-घर जाकर वोट मांगने वाले तरुण चुघ  का राजनीतिक सफर संघर्ष और कड़े परिश्रम के साथ जुड़ा हुआ है। शक्ति नगर के टंकी वाले पार्क में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शाखा में राजनीति का ककहरा पढ़ने वाले तरुण चुघ के पिता बनारसी दास भी संघ के कार्यकर्ता थे।

मंडल राजनीति के उफान ने तरुण चुघ को गुरु नगरी में एक अलग पहचान दी। युवाओं के पक्ष में रोष रैली निकाल कर तरुण ने जहां कॉलेज विद्यार्थियों को अपने साथ जोड़ा, वहीं अपने सहपाठियों को भी भाजपा की विचारधारा अपनाने की प्रेरणा दी।

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1992 में विवादित ढांचा गिरने के बाद तरुण ने राजनीतिक सरगर्मियां बढ़ाई। भाजपा की वरिष्ठ नेता उमा भारती के संपर्क में आने के बाद तरुण ने जिला भाजपा युवा मोर्चा के अध्यक्ष पद की जिम्मेदारी निभाई। पंजाब भाजपा युवा मोर्चा के महासचिव बने। 

पंजाब भाजपा युवा मोर्चा के अध्यक्ष पद की जिम्मेदारी संभालते हुए तरुण ने देश की एकता व अखंडता को बनाए रखने के लिए अमृतसर से लेकर अटारी बार्डर तक मानव श्रृंखला बनाई थी। उस कार्यक्रम में उमा भारती विशेष रूप में पहुंची थीं। इसी कार्यक्रम ने तरुण चुघ की पहचान प्रदेश व देश के वरिष्ठ नेताओं के बीच बना दी थी।

तरुण चुघ ने अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद व भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष कमल शर्मा के साथ साइकिल पर बैठकर पार्टी का प्रचार व प्रसार किया। 2000 से 2003 तक चुघ प्रदेश भाजपा सचिव रहे। 2005 में उन्हें प्रदेश प्रशिक्षण सेल का अध्यक्ष बनाया गया। 

दो बार विधानसभा चुनाव लड़ा
चुघ ने केंद्रीय विधानसभा हलके से दो बार 2012 व 2014 में चुनाव लड़ा लेकिन दोनों बार उन्हें करारी हार का सामना करना पड़ा। 2012 के चुनाव में वह अपने घर का बूथ तक हार गए थे।  
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