किसानों के मुद्दे पर भाजपा से गठबंधन टूटने और शिरोमणि अकाली दल के संरक्षक बड़े बादल यानी प्रकाश सिंह बाल के निधन के बाद यह पहला लोकसभा चुनाव है। मगर, आप, कांग्रेस और भाजपा ने छोटे बादल और शिअद प्रधान सुखवीर सिंह बादल की पत्नी हरसिमरत कौर की बठिंडा में जिस तरह घेराबंदी की है, उससे चुनाव बेहद दिलचस्प हो गया है।
शिअद ने अपना गढ़ बचाने और आप ने छीनने के लिए पूरी ताकत झोंक रखी है। बठिंडा के रोज गार्डन में मॉर्निंग वॉक के लिए आए सेवानिवृत्त कर्मचारी रणवीर सिंह कहते हैं, लगातार जीत के आदी रहे बुजुर्ग बड़े बादल हार का सदमा सहन नहीं कर पाए और एक साल पूरा होते-होते उनका निधन हो गया। वह बहुत अच्छे नेता थे। जब वह मुख्यमंत्री थे तो कांग्रेस और आप के नेता अलग-अलग उनके आवास पर धरना देने पहुंच गए।
बड़े बादल ने उनके लिए टेंट लगवाए और उनकी बात सुनी। आज कहां हैं ऐसे लोग? इस सीट पर बादल की बहू व पूर्व केंद्रीय मंत्री हरसिमरत कौर लगातार तीन बार से सांसद हैं और चौथी बार मैदान में हैं। आप ने अब हरसिमरत के सामने गुरमीत सिंह खुडियां को ही उतारा है। खास बात है कि बठिंडा लोकसभा क्षेत्र में जो नौ विधानसभा सीटें हैं, वर्तमान में उन सभी पर आप का ही कब्जा है।
मुश्किलें इतनी भर नहीं हैं। गठबंधन तोड़ने से नाखुश भाजपा भी अपने पुराने सहयोगी दल को जैसे सबक सिखाने पर आमादा है। उसने पूर्व आईएएस अधिकारी परमपाल कौर को प्रत्याशी बनाया है। परमपाल वीआरएस लेकर चुनाव मैदान में आई हैं।
परमपाल बादल परिवार के करीबी पूर्व मंत्री सिकंदर सिंह मलूका की बहू हैं। हालांकि, मलूका ने अभी तक अकाली दल नहीं छोड़ा है। दूसरी ओर बार-बार इस सीट पर मात खा रही कांग्रेस तो जैसे ताक में ही थी। उसने भी पुराने कांग्रेसी और तीन बार के विधायक रहे जीत मोहिंदर सिंह सिद्धू की अकाली दल से घर वापसी करवाकर उतार दिया है।
मुफ्त के वादों से मतदाताओं में बेचैनी भी
तलवंडी साबो से मंडी गेहूं ले जा रहे किसानों की चौंकाने वाली बात सामने आई। कश्मीर सिंह कहते हैं, बिजली सस्ती चाहिए, मुफ्त नहीं। सस्ती व अच्छी पढ़ाई चाहिए। नशाखोरी पर बंदी चाहिए। मुफ्तखोरी से कर्ज बढ़ेगा और उसकी कीमत बाद में हम ही चुकाएंगे। सिर्फ इलाज मुफ्त होना चाहिए। साथी कमलवीर और हरनेक सिंह भी यही बात कहते हैं। ढाबे पर काम करने वाले एटा के योगेश वर्मा कहते हैं कि किसान भाजपा छोड़ सब पार्टियों में बंटे हैं। बाहरी लोग राम मंदिर बनने से मोदी के साथ हैं।
मनप्रीत का मन कहां
बड़े बादल के भतीजे व पूर्व वित्त मंत्री मनप्रीत सिंह बादल पहले शिअद का हिस्सा थे। बाद में कांग्रेस में चले गए। हरसिमरत से ही 2014 का आम चुनाव हारे थे। 2022 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की हार के बाद मनप्रीत भाजपा में शामिल हो गए। बठिंडा से करीब 35 किमी दूर बादल गांव के पास मिले परमिंदर सिंह कहते हैं कि मनप्रीत जिस दल में रहते हैं, वहां उनका मन नहीं लगता। 2019 में कांग्रेस में थे। लेकिन, चर्चा रही कि अंदरखाने अपनी भाभी हरसिमरत की मदद की। तब कांग्रेस के दिग्गज नेता व मौजूदा प्रदेश प्रधान अमरिंदर सिंह राजा वडिंग हरसिमरत से हार गए। मनप्रीत इस बार भाजपा में हैं। वह दूसरी सीटों पर तो नजर आ रहे हैं, लेकिन बठिंडा में नहीं दिख रहे हैं।
इसलिए बठिंडा है बादल परिवार का गढ़
दिवंगत प्रकाश सिंह बादल इसी लोकसभा क्षेत्र की लंबी विधानसभा सीट से चुनाव जीतकर रिकॉर्ड पांच बार मुख्यमंत्री बने।
- बादल 1967 में पहला और 2022 में अपना आखिरी चुनाव हारे। 1969 से लेकर 2017 तक वह कोई चुनाव नहीं हारे। बठिंडा सीट पर 17 बार लोकसभा चुनावों में से 10 बार शिरोमणि अकाली दल (ब) का कब्जा रहा है।
शिअद के कैडर वोट बैंक में सेंधमारी की आशंका
बीवी हरसिमरत कौर 2009 में पूर्व मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह के बेटे रणइंदर सिंह, 2014 में पूर्व वित्त मंत्री मनप्रीत बादल और 2019 में कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष अमरिंदर सिंह राजा वडिंग जैसे दिग्गजों को हरा चुकी हैं।
इस बार कांग्रेस व भाजपा प्रत्याशी के शिरोमणि अकाली दल (ब) के पृष्ठभूमि से होने से शिअद (ब) के आधार वोटों में सेंध की आशंका बढ़ गई है। आप के गुरमीत सिंह खुडियां के सामने होने से यहां चतुष्कोणीय लड़ाई नजर आ रही है।
कांग्रेस को मूसेवाला परिवार का मिला साथ
बठिंडा के लिए सिद्धू मूसेवाला की हत्या एक बड़ा फैक्टर है। सिद्धू कांग्रेस से चुनाव लड़ चुके थे। चर्चा थी कि कांग्रेस से नाराज सिद्धू के पिता बलकौर सिंह निर्दल चुनाव लड़ सकते हैं। पर, कांग्रेस ने उन्हें मना लिया है। ध्यान रहे सिद्धू की हत्या से नाराज जनता ने संगरूर उपचुनाव में आप को हरा दिया था।
बलकौर के समर्थन के एलान से कांग्रेस को बड़ी राहत मिली है। हालांकि, कांग्रेस की एक मुश्किल ये है कि वह हर चुनाव में बठिंडा से अपना प्रत्याशी बदल देती है। इस बार भी ऐसा ही किया है।
बेअदबी मामले में कार्रवाई पर बेरुखी से सब निशाने पर
बादल शासनकाल में 2012-2017 के दौरान श्री गुरु ग्रंथ साहिब की बेअदबी की हुई घटनाएं अब भी एक बड़ा मुद्दा हैं। बादल परिवार इस पर माफी मांग चुका है। कांग्रेस व आप कड़ी कार्रवाई का वादा कर बारी-बारी से सत्ता में आ चुकी हैं।
बेअदबी कांड के दोषियों के मामले में कार्रवाई में दिलचस्पी नहीं लेने से लोग कांग्रेस और आप को भी घेरते नजर आते हैं।
बड़े बादल के नाम पर सहानुभूति भी
बठिंडा से 15 किमी दूर इच्छापूर्ति हनुमान मंदिर के पास मिले सुखबिंदर सिंह कहते हैं, बड़े बादल को हराकर लोग पछता रहे हैं। उनके न रहने से सहानुभूति है। एक जमाना था, जब सरकारी अधिकारी बठिंडा तबादला होने पर रुकवाने में जुट जाते थे। इतना पिछड़ा था। आज बठिंडा में क्या नहीं है? चौड़ी-चौड़ी सड़कें हैं। केंद्रीय यूनिवर्सिटी है। पावर प्लांट हैं। एम्स है, जहां 10 रुपये के पर्चे पर इलाज होता है।
हरसिमरत कौर हमेशा बठिंडा के लोगों के बीच रहती हैं। लोगों को और क्या चाहिए? किसानों का मामला आया, तो बड़े बादल ने भाजपा जैसे पुराने साथी को छोड़ दिया। हरसिमरत ने मंत्री पद छोड़ा। इसलिए यहां के किसान साथ हैं।