पंजाब कला भवन के मंच पर मुख्तारा माई के दर्द ने एक नया संदेश दिया। गुरशरण सिंह नाटक उत्सव के तीसरे दिन मन मिट्टी का बोल्या नाटक का मंचन किया गया।
पाकिस्तानी पृष्ठभूमि पर आधारित यह नाटक गलत मान्यताओं को दर्शाता है। मुख्तारा माई की ये कहानी जून 2002 से शुरू होती है। पंचायत (जिरगा) पांच मर्दों को एक औरत का गैंगरेप करने का फसला सुनाती है।
उसे यह सजा उसके बारह साल के भाई द्वारा मस्तोई जाति की 27 साल की लड़की को छेड़ने के जुर्म की मिलती है। मुख्तारा ने इसका विरोध किया तो उसको फैसला तन पर सहना पड़ा।
फैसला होता है जिना-बिल-जबर यानि बलात्कार के बदले बलात्कार। मुख्तारा ने संघर्ष किया और वह गुज्जर जाति की उन लड़कियों से अलग हो गई जो ऐसे हालात में खुदकुशी कर जाती हैं।
यह घटना विश्व पटल पर चर्चा का विषय बनी तो जनरल मुशर्रफ सरकार ने औरत को पांच लाख रुपये थमा दिए। उसने उन पैैसों से एक स्कूल खोल लिया।
इसमें उसने बच्चों को सिखाना शुरू किया कि शरीयत के नाम पर औरतों पर गैस इस्लामी फैसले थोपे जा रहे हैं। यह सच्चा इस्लाम नहीं है।
‘मन मिट्टी दा बोल्या’ नाटक की कहानी मुख्तारा की ओर से एक बड़े अंगूठे के साथ अपना अंगूठा लगाने की कोशिश के संग शुरू होती है। उसकी सहेली नसीम उसको मना करती है। वह स्कूल खोलकर अपना संदेश दे देती है।
इस नाटक की स्क्रिप्ट शब्दीश ने तैयार की। इस नाटक को अनीता शब्दीश ने सुचेतक रंगमंच के लिए निर्देशित किया। नाटक में उसकी सहेली नसीम की भूमिका रिचा और अब्बा की भूमिका सनी गिल ने अदा की। इनके अतिरिक्त बलजिंदर कौर, अभिलाष, हर्पिंदर सिंह ने नाटक के अन्य पात्रों की भूमिका निभाई।