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36 साल से पिछड़े वर्ग क्या आगे ही नहीं बढ़े, क्यों नहीं हुआ रिव्यू : हाईकोर्ट

Wed, 21 Dec 2016 08:07 PM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, शाहबाद(कुरुक्षेत्र)
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कोर्ट - फोटो : डेमो फोटो
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पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने हरियाणा और केंद्र सरकार से पूछा है कि क्या 36 साल में पिछड़े वर्ग की कोई जाति आगे नहीं आई।
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संविधान बनने के बाद से राजनीति के लिए आरक्षण का इस्तेमाल और आरक्षण व्यवस्था को रिव्यू करने का प्रावधान होने के बावजूद इसकी समीक्षा न होने पर पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने हरियाणा और केंद्र सरकार से पूछा है कि क्या 36 साल में पिछड़े वर्ग की कोई जाति आगे नहीं आई।

मंडल कमिशन की रिपोर्ट के आधार पर दिए गए आरक्षण को रिव्यू न करने को चुनौती देने वाली याचिका में कहा गया कि मंडल कमिशन ने 1980 में अपनी रिपोर्ट सौंपी थी और इसके आधार पर 15 साल बाद आरक्षण दिया गया, जो गलत है।
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एनसीबीसी की गाइड लाइन के अनुसार व इंदिरा साहनी और राम सिंह मामले में सुप्रीम कोर्ट ने आरक्षण की समीक्षा के बारे में कहा था, लेकिन आज तक समीक्षा नहीं हुई है। इस मामले में हरियाणा व केंद्र सरकार को 15 फरवरी तक जवाब दाखिल करना होगा।

आजादी से अब तक राजनी​ति के लिए आरक्षण का प्रयोग

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याचिका दाखिल करते हुए स्नेहांचल चेरिटेबल सोसाइटी की ओर से एडवोकेट सुधीर कुमार हुडा ने कहा कि भारत में आजादी के बाद जब संविधान में आरक्षण का प्रावधान किया गया, तब से लेकर अब तक राजनीति के लिए इसका इस्तेमाल किया गया है। वोट बैंक के लिए आरक्षण पाने वाली जातियों की संख्या में बढ़ोत्तरी को कर दी जाती है परंतु किसी जाति को इससे बाहर नहीं किया जाता है।

याची ने कहा कि आरक्षण लागू करते हुए हर 10 वर्ष में इसे रिव्यू करने का प्रावधान रखा गया था परंतु यह कार्य किसी ने भी नहीं किया। याची ने कहा कि हरियाणा में आरक्षण के लिए मंडल कमिशन की रिपोर्ट को 1995 में अपनाया गया और इस रिपोर्ट के आधार पर शेड्यूल ए और बी तैयार किया गया था। इस रिपोर्ट में भी यह कहा गया था कि 20 वर्षों में पिछडे़ वर्ग को दिए गए आरक्षण की समीक्षा की जाए।

याची ने कहा कि इस आयोग की रिपोर्ट को 1980 में सौंपे जाने के बाद 1995 में अपनाया गया, जिससे 15 साल वैसे ही बीत गए। इसके चलते 2000 में इसकी समीक्षा होनी चाहिए थी परंतु 2016 तक 36 साल बीत गए हैं, लेकिन किसी भी स्तर पर समीक्षा का प्रयास नहीं किया गया।
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याचिकाकर्ता ने अदालत को बताया समीक्षा करने का प्रोसेस

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याची ने कहा कि एनसीबीसी और सुप्रीम कोर्ट ने इंदिरा साहनी मामले में आरक्षण व्यवस्था के लिए आंकड़े एकत्रित करने और समीक्षा करने के लिए पूरा प्रोसेस बताया है, लेकिन राजनीतिक पार्टियों ने हित साधने के लिए इस प्रोसेस को अपनाया ही नहीं। 1993 में कंबोज कमिशन बनाया गया तो वहीं 1999 में गुरनाम सिंह कमिशन बनाया गया।

इन सभी में कुछ जातियों को पिछड़ा वर्ग में शामिल करने की बात तो कही गई परंतु आंकड़ों के आधार पर किसी को बाहर करने की बात नहीं कही गई। याची ने कहा कि 1951 से लेकर अभी तक केवल जातियों को शामिल ही किया गया है। हाईकोर्ट ने याची से पूछा कि इस बारे में किया किया जा सकता है। याचिकाकर्ता ने बताया कि उसने वर्तमान में हरियाणा सरकार द्वारा बनाए गए पिछड़ा वर्ग को आरक्षण देने वाले एक्ट को चुनौती दी है।

ऐसे में इन सभी के आरक्षण की समीक्षा का जिम्मा सौंपा जाना चाहिए और यह जानने का प्रयास किया जाना चाहिए कि कौन सी जाति आरक्षण का लाभ पाकर आगे बढ़ी है और उस जाति को पिछड़ा वर्ग की सूची से बाहर किया जाना चाहिए। याची ने उदाहरण के माध्यम से कहा कि  1951 से 71 जातियों को पिछड़ा वर्ग के तहत आरक्ष लाभ प्राप्त है और क्या अभी तक इन में से कोई एक जाति भी आगे नहीं बढ़ पाई है। हाईकोर्ट ने याची पक्ष की दलीलों को सुनने के बाद हरियाणा व केंद्र सरकार को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है।
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