पंजाब में हजारों करोड़ रुपये के नशे के कारोबार मामले में फंसे पुलिस अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग वाली याचिका पर सुनवाई के दौरान पंजाब सरकार ने कहा कि वह दोषी पुलिस अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई को तैयार है लेकिन तीनों सीलबंद रिपोर्ट सरकार के पास नहीं हैं। तीनों रिपोर्ट हाईकोर्ट में सीलबंद लिफाफे में हैं और इनके खुलने के बाद कोर्ट जो आदेश जारी करेगा उसके अनुरूप कार्रवाई की जाएगी।
पंजाब ब्यूरो ऑफ इन्वेस्टिगेशन के एआईजी सरबजीत सिंह ने हलफनामे के माध्यम से हाईकोर्ट को बताया कि नशे के कारोबार में लिप्त होने के आरोपी पुलिस अधिकारियों के खिलाफ हाईकोर्ट ने जांच का आदेश दिया था। दिसंबर 2017 में तत्कालीन डीजीपी सिद्धार्थ चट्टोपाध्याय को जांच की जिम्मेदारी दी गई थी। चट्टोपाध्याय ने 1 फरवरी 2018, 15 मार्च 2018 और 8 मई 2018 को तीन रिपोर्ट हाईकोर्ट में सीलबंद लिफाफे में सौंपी थी।
मोगा के एसएसपी राजजीत सिंह और इंस्पेक्टर इंदरजीत सिंह के मामले की जांच हाईकोर्ट ने एसटीएफ को सौंपी थी। राजजीत सिंह ने हाईकोर्ट में अर्जी दायर कर कहा था कि एसटीएफ के मुखिया हरप्रीत सिंह सिद्धू उनके मामले की निष्पक्ष जांच नहीं कर सकते हैं। इसके बाद हाईकोर्ट ने डीजीपी सिद्धार्थ चट्टोपाध्याय, एडीजीपी प्रबोध कुमार और आईजी कुंवर विजय प्रताप सिंह की एसआईटी गठित कर जांच का आदेश दिया था।
इस जांच कमेटी ने अपनी रिपोर्ट सीधे हाईकोर्ट को सौंपी थी। इसके अलावा सिद्धार्थ चट्टोपाध्याय ने अलग से दो रिपोर्ट भी सीधे हाईकोर्ट को ही सौंपी थी। ऐसे में ये रिपोर्ट हाईकोर्ट में सीलबंद लिफाफे में हैं। लिहाजा इन रिपोर्ट पर कार्रवाई न करने का पंजाब सरकार पर आरोप लगाना सही नहीं है। कोर्ट को बताया गया कि अन्य रिपोर्ट पर पंजाब सरकार कार्रवाई कर रही है। अब हाईकोर्ट आदेश करे तो इन तीन रिपोर्ट पर भी कार्रवाई के लिए सरकार तैयार है।
बुधवार को सीनियर एडवोकेट आरएस चीमा की माता के देहांत के बाद भोग के कारण वह इस सुनवाई में शामिल नहीं हो पाए थे। उनके अलावा भी अन्य एडवोकेट सुनवाई में शामिल नहीं हो पाए जिसके चलते हाईकोर्ट ने मामले की सुनवाई 28 मार्च तक स्थगित कर दी है।
बर्खास्त डीएसपी बलविंदर सिंह सेखों को हाईकोर्ट की अवमानना का नोटिस जारी
हाईकोर्ट के जजों पर आपत्तिजनक आरोप लगा सोशल मीडिया में वीडियो वायरल करने वाले बर्खास्त डीएसपी बलविंदर सिंह सेखों को हाईकोर्ट ने बुधवार को अवमानना का नोटिस जारी कर दिया है। हाईकोर्ट ने कहा कि उन्होंने वह वीडियो देखा है जिसमें वह इस तरह के आपत्तिजनक आरोप लगा रहे हैं जो न्यायपालिका की छवि को धूमिल करने वाले हैं। ऐसा करना सीधे तौर पर न्यायालय की अवमानना का मामला बनता है। ऐसे में वह कारण बताएं कि उनके खिलाफ न्यायालय की अवमानना के तहत कार्रवाई का आदेश क्यों न दिया जाए।