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PEC: आईएएफ हेरिटेज सेंटर को कानपुर-1 एयरक्राफ्ट सौंपेगा पेक, 1967 में पूर्व एयर वाइस मार्शल ने किया था गिफ्ट

Sun, 13 Nov 2022 08:24 AM IST
निवेदिता वर्मा कविता बिश्नोई, अमर उजाला, चंडीगढ़

सार

एयरक्राफ्ट को वर्ष 1967 में पूर्व एयर वाइस मार्शल हरजिंदर सिंह माहल ने संस्थान के साथ जुड़ाव के चलते सौंपा था। उस दौरान इसके लिए पेक की ओर से सात हजार 455 रुपये का टोकन अमाउंट दिया गया था।
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कानपुर 1 एयरक्राफ्ट - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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चंडीगढ़ के सेक्टर-12 स्थित पंजाब इंजीनियरिंग कॉलेज (पेक) स्वदेशी डिजाइन और निर्माण किए गए कानपुर-1 एयरक्राफ्ट को सेक्टर-18 स्थित इंडियन एयर फोर्स हेरिटेज सेंटर को अगले हफ्ते सौंपने जा रहा है।

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इस एयरक्राफ्ट को वर्ष 1967 में पूर्व एयर वाइस मार्शल हरजिंदर सिंह माहल ने संस्थान के साथ जुड़ाव के चलते सौंपा था। उस दौरान इसके लिए पेक की ओर से सात हजार 455 रुपये का टोकन अमाउंट दिया गया था। वर्तमान में एयरक्राफ्ट को एरोस्पेस इंजीनियरिंग विभाग की एयरक्राफ्ट इंस्ट्रूमेंट एंड एयरफ्रेम लैब में पार्क किया गया है। 

पेक में एयरक्राफ्ट को हेरिटेज सेंटर-18 को सौंपने के लिए कार्यक्रम आगामी हफ्ते में आयोजित किया जाएगा। इसमें एयरफोर्स के अधिकारी शामिल होंगे। इसको लेकर पेक निदेशक डॉ. बलदेव सेतिया की एआईएफ हेरिटेज सेंटर के निदेशक ग्रुप कैप्टन पीएस लांबा के साथ चर्चा हुई है। पेक निदेशक डॉ. बलदेव ने बताया कि दस दिन पहले ही एयरक्राफ्ट को हेरिटेज सेंटर में प्रदर्शित करने को लेकर सहमति हुई है क्योंकि पेक लैब से हेरिटेज सेंटर में इसकी विजिबलिटी अधिक होगी। इसके साथ बोर्ड पर अंकित किया जाएगा कि वर्ष 1967 से यह एयरक्राफ्ट पेक के संरक्षण में था। 
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पेक ने इंडो-चाइना युद्ध के बाद दिए देश को पहले 17 एरोनॉटिकल इंजीनियर 
पेक ने देश को वर्ष 1964 में पहले 17 एरोनॉटिकल इंजीनियर दिए थे। वर्ष 1962 के इंडो-चाइना युद्ध के बाद पूर्व एयर वाइस मार्शल हरजिंदर सिंह माहल ने पेक सें संपर्क साधा और एरोनॉटिकल इंजीनियर तैयार करने की मांग की। इस दौरान वर्ष 1962 में मैकेनिकल इंजीनियरिंग, सिविल इंजीनियरिंग आदि विभागों के दूसरे वर्ष के 17 युवाओं ने एरोनॉटिकल इंजीनियरिंग कोर्स में आने की इच्छा जताई। हालांकि उस मौके पर विभाग तैयार नहीं हो सका, इसलिए इन छात्रों की कक्षाएं आईआईएससी बैंगलुरु, आईआईटी मद्रास और आईआईटी कानपुर में लगाई गई। आईआईएससी के तत्कालीन निदेशक और पेक एलुमनी एरोस्पेस इंजीनियर सतीश धवन ने इन 17 युवाओं की अधिकतम कक्षाएं लीं और इन्हें तैयार किया गया। इसके बाद वर्ष 1964 में पेक की डिग्री के साथ पहले 17 एरोनॉटिकल इंजीनियरों को इंडियन एयरफोर्स को सौंपा गया। 

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