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प्रशासन की कारगुजारी से खुश नहीं बाशिंदे, ऐसे कराया अहसास

Thu, 05 May 2016 11:30 AM IST
राजेश ढल्ल/अमर उजाला, चंडीगढ़
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चंडीगढ़ प्रशासन - फोटो : DEMO Pics
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प्रशासन की कारगुजारी से शहरवासियों का मोह इस कदर भंग हुआ कि उन्होंने वाटर बायलाज पर एक भी राय नहीं दी। दरअसल प्रशासन की कारगुजारी से शहरवासी कितने संतुष्ट हैं, इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि संशोधित वाटर बायलाज के संबंध में प्रशासन तक एक भी सुझाव नहीं पहुंचा।
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बुधवार को प्रशासन ने संशोधित वाटर बायलाज की अधिसूचना जारी कर दी। लेकिन अधिसूचना के लिए प्रशासन ने पिछले साल 12 नवंबर को शहरवासियों से आपत्तियां दर्ज करवाने और सुझाव देने के लिए एक माह का समय दिया था। लेकिन एक इस दौरान किसी शहरवासी से अपना सुझाव नहीं दिया। यह बात प्रशासन ने अपनी अधिसूचना नोट में कही है कि किसी ने कोई सुझाव और आपत्ति दर्ज नहीं करवाई है। लोगों का कहना है कि प्रशासन जब किसी की कोई सलाह मानता नहीं तो फिर उसके लिए समय व्यर्थ करने का क्या फायदा।

लोगों ने तर्क दिया है कि हाल ही में चंडीगढ़ में बिजली के रेट बढ़ाए गए हैं। इस संबंध में जब शहरवासियों से सुझाव मांगे गए थे तो अधिकतर संगठनों और लोगों ने बिजली के रेट न बढ़ा कर बिजली की चोरी रोकने पर कदम उठाने की सलाह दी थी।  लेकिन प्रशासन ने जनता की सलाह मानने की बजाय सीधे बिजली के रेट बढ़ाने का फैसला ले लिया। वहीं स्मार्ट सिटी के संशोधित प्रस्ताव पर भी नाममात्र के लोगों ने ही सुझाव दिए हैं।
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किसी राजनीतिक दल ने भी नहीं दिया सुझाव: शहर में पानी की किल्लत को लेकर कांग्रेस और भाजपा जमकर जमकर शोर शराबा कर रही हैं। लेकिन उन्होंने भी संशोधित वाटर बायलाज के संबंध में कोई सुझाव नहीं दिया। राजनीतिक दलों के नेता सिर्फ शहर में पानी की किल्लत को लेकर एक दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप लगा रहे हैं।

एडवाइजरी काउंसिल की बैठक ही नहीं हुई: पिछले दो साल से प्रशासन ने एडवाइजरी काउंसिल की कोई बैठक नहीं बुलाई है। जबकि इस कमेटी में शहर के जनप्रतिनिधियों, मेयर, पूर्व मेयर, व्यापार मंडल और फासवेक के प्रतिनिधियों के साथ ही समाजसेवी शामिल होते हैं। काउंसिल में इन लोगों को इसलिए शामिल किया गया था कि प्रशासन की नीतियों और शहर के फैसलों में उनकी राय ली जा सके। लेकिन पिछले दो साल से एडवाइजरी काउंसिल की बैठक ही नहीं बुलाई गई तो उनकी राय क्या ली जाएगी। अब प्रशासन काउंसिल का पुनर्गठन करने की तैयारी में है। काउंसिल की बैठक 20 जून  2014 को तत्कालीन प्रशासक शिवराज पाटिल के नेतृत्व में हुई थी । उसके बाद से प्रशासन ने अब तक किसी भी सदस्य से कोई सुझाव नहीं लिया है। प्रशासन तीन साल से वार्ड कमेटियों का भी गठन नहीं कर पा रहा है। 

हर फ्लोर मीटर जरूरी करके निगम को होगा घाटा: इस समय नगर निगम को हर साल पानी की सप्लाई से 60 करोड़ रुपये का घाटा उठाना पड़ रहा है। नई अधिसूचना के अनुसार हर फ्लोर के लिए पानी का मीटर लगाना जरूरी कर दिया गया है। इस नियम से नगर निगम का रेवेन्यू कम होगा जबकि उन लोगों को फायदा होगा जो पानी की खपत कम करते है। इस समय नगर निगम की ओर से 60 किलो लीटर से अधिक पानी प्रयोग करने पर 8 रुपये प्रति किलो लीटर का रेट लगता है। जबकि इसके नीचे की स्लैब का रेट कम है। एक से 15 के लिए 2 रुपये प्रति किलो लीटर, 16 से 30 के लिए 4 और 31 से 60 किलोलीटर का रेट 6 रुपये प्रति किलोलीटर चार्ज किया जाता है।

ऐसे में जिस तीन मंजिला इमारत में एक ही मीटर से पूरे घर का पानी आता था तो उस घर की पानी की खपत 60 किलो लीटर से अधिक होना स्वाभाविक है।  लेकिन एक फ्लोर का अलग मीटर होने से कई लोगों की पानी की खपत 16 से 30 और 31 से 60 किलो लीटर वाली स्लैब के बीच में ही होगी। ऐसे में निगम की आय कम होना तय है। वहीं नए संशोधित बायलाज के अनुसार अब अगर कोई अस्थायी कनेक्शन के बाद अपनी इमारत में स्थायी कनेक्शन नहीं लेता है तो उससे कामर्शियल रेट चार्ज किया जाएगा।

बलजिंदर सिंह बिट्टू, फासवेक चेयरमैन ने बताया कि सुझाव और आपत्तियां मांग कर प्रशासन सिर्फ एक दिखावा करता है। उशहरवासियों के सलाह और आपत्तियां दर्ज करवाने का क्या फायदा, जब प्रशासन को उस पर अमल ही नहीं करना। बिजली का रेट न बढ़ाकर चोरी रोकने की सलाह दी गई थी, जिसे प्रशासन ने नहीं माना।
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