शनिवार सुबह टैगोर थिएटर में शहर की विभिन्न धार्मिक संगठनों ने नाटक ‘धर्मराज डॉट कॉम का बहिष्कार कर दिया। इन संगठनों में आसाराम आश्रम, डेरा सच्चा सौदा, आरएसएस, बजरंग दल शामिल थे।
सुबह 9 बजे से ही दलों ने टैगोर थिएटर में प्रदर्शन किया, जिसके बाद नाटक की निर्देशिका संगीता गुप्ता ने अपनी टीम के साथ दलों को बैठा कर नाटक की स्क्रिप्ट सुनाई।
इसे सुनने के बाद दलों ने आपत्ति जताई और इसके खिलाफ नारे लगाए। मौके की गंभीरता को देखते हुए पुलिस ने इसमें हस्तक्षेप किया और थिएटर के गेट बंद कर दिए गए।
ये बोले बजरंग दल के नेता
नाटक के कई पोस्टर शहर और आस पास लगाए गए, जिसमें किरदार के हाथों में गदा और देवताओं का गेटअप था। हमने इस नाटक की निर्देशिका से भी बात की और इस नाटक की स्क्रिप्ट भी पढ़ी, जिससे लगा कि इसमें हिंदू धर्म और संतों की छवि खराब की गई है। इसलिए हमने इस नाटक का बहिष्कार करने का फैसला किया है।
नरेश अरोड़ा, नेता, बजरंग दल
कलाकारों ने भी रखा पक्ष
नाटक के लिए डीसी से बात की गई है और उन्होंने आश्वासन दिलाया था कि दूसरे गुट से बात करके वह कुछ फैसला ले सकते हैं। नाटक की कहानी सामाजिक बुराइयों के विरोध में हैं, जिसमें कुछ इंसानों के मरने पर उनका फैसला धर्मराज करते हैं कि उन्हें कहां भेजा जाए जिसके बाद उन लोगों को नर्क भेज दिया जाता है और उन्हें गर्म पानी में उबालने की सजा मिलती है। नाटक में धर्मराज की बहन और उसका परिवार भी दिखाया गया है और आजकल होने वाली हर समस्या को पेश किया गया है। पता नहीं क्यों यह लोग इसका विरोध कर रहे हैं जबकि यह सिर्फ एक जरिया है।
- संगीता गुप्ता, निर्देशिका
नाटक में आजकल के पंजाब का हाल दिखाया गया है। इन दलों को तब कोई फर्क नहीं पड़ता जब एक लड़की पर तेजाब फेंक दिया जाता है। लड़कियों के लिए गंदी शब्दावली वाले गाने गाए जाते हैं, उनका विरोध नहीं होता। नाटक की टैग लाइन अच्छे दिन आने वाले हैं, थी जिसमें राजनेताओं की भी आलोचना की गई है और शायद इसलिए ही यह नाटक का विरोध कर रहे हैं। समाज की भलाई से इनका कोई लेना देना नहीं है। एक कलाकार इनसे पूछ कर तो नहीं लिख सकता। 1990 में भी मैं गुरशरण सिंह के साथ उनके नाटक ‘बाबा बोलदा है’ में काम कर रहा था उस समय भी ऐसे संगठनों ने प्रदर्शन करके उसका मंचन रुकवा दिया था।
मलकीत सिंह, नाटक के अदाकार
नाटक रिहर्सल के दौरान ही लिखा गया था और इसमें असल इतिहास से कुछ बदलाव भी किए गए थे, लेकिन अगर हमें कोई खास वजह बताई जाए तो हम नाटक में वह बदलाव करने को तैयार थे, लेकिन हमें दलों ने कोई खास तर्क नहीं दिया। नाटक में इतनी मेहनत लगी है। इसे बनाने में कई महीने लग जाते हैं और जब ऐसा रिस्पांस मिलता है तो बहुत बुरा लगता है।
गुरचेत चित्रकार, नाटक के लेखक और अदाकार
शाम को कलाकारों का ब्लैक-डे
शाम को नाटक न होने पर निर्देशिका संगीता गुप्ता और नाटक के कलाकार ब्लैक डे के पोस्टर लिए खड़े हो गए। नाटक देखने पहुंचे सभी दर्शकों से उन्होंने नाटक नहीं होने की माफी मांगी और इसके लिए चंडीगढ़ प्रशासन को जिम्मेदार ठहराया।
नाटक में कई ऐसी बातें हैं जो धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचा रही थीं। इसलिए इसकी संवेदनशीलता को देखते हुए नाटक को बैन करना पड़ा।
मोहम्मद शाईन, डिप्टी कमिश्नर, यूटी