इसके बाद अज्ञात लोगों से उन्हें धमकियां मिल रही हैं। उन्हें डेरा सच्चा सौदा की खबरें छापने से बाज आकर सीधे रास्ते पर आने को कहा जाता है, उन्हें धमकी दी जाती है कि ‘जे तू सिद्दे राह न आया, तां सानूं रस्ते ते लिआउणा चंगी तरांह आउंदा है’। इसके साथ ही अखबार के कार्यालय में भी तोड़फोड़ की धमकी भी दी जाती है।
इसके अलावा 10 जून 2002 को अखबार का कार्यालय बंद था, 9 जून के अंक में इसकी सूचना भी छापी गई थी, उसके बावजूद डेरे के कुछ अनुयायी आतंकित करने के इरादे से कार्यालय में आकर मेरे बारे में पूछताछ करने लगे।
इससे साफ हो गया है कि डेरे के लोग मुझे और मेरे अखबार को नुकसान पहुंचाना चाहते हैं। एसपी महोदय, मैं एक शांतिप्रिय नागरिक होने के साथ-साथ एक प्रतिबद्ध पत्रकार हूं और अपनी लेखकीय प्रतिबद्धता के साथ लेस पात्र भी समझौता नहीं कर सकता। असामाजिक तत्व लगातार मुझे धमकियां दे रहे हैं।
इसलिए मैं आपसे अपनी और अपने कार्यालय को सुरक्षा प्रदान करने की मांग करता हूं। साथ ही मुझे धमकियां देने वाले असामाजिक तत्वों पर पुलिस द्वारा कड़ी नजर रखने का आग्रह करता हूं। आवश्यक कार्रवाई किए जाने के कामना के साथ आभार- रामचंद्र छत्रपति।’
इस पूरे प्रकरण में उस वक्त भी पुलिस की भूमिका संदेह के घेरे में आई, जब गोलियां लगने के बाद कुछ समय के लिए छत्रपति के हालात सामान्य होने लगे थे, तो छत्रपति के बेटे अंशुल चाहते थे कि पुलिस उनके पिता का स्टेटमेंट दर्ज कर ले, इसके लिए वह भटकते रहे, लेकिन पुलिस ने ऐसा नहीं किया। दिवंगत रामचंद्र छत्रपति के बेटे अंशुल ने बताया कि 24 अक्तूबर 2002 को उनके पिता पर घर के बाहर गोलियां बरसाईं गई। मगर उनके पिता का निधन 21 नवंबर को हुआ था।
रामचंद्र छत्रपति 28 दिन तक उपचाराधीन रहे। जबकि 8 नवंबर 2002 तक तो उनकी हालत बहुत ही सामान्य हो रही थी। अंशुल ने बताया कि वह बार-बार पुलिस के पास धक्के खाते रहे कि कम से कम उनके पिता का बयान तो ले लिया जाए, उनके पिता अपने हत्यारों के बारे में सब कुछ जानते हैं। लेकिन पुलिस ने ऐसा नहीं किया।
8 नवंबर के बाद अचानक उनके पिता की तबीयत बिगड़ी, तो उन्हें दिल्ली के एक प्राइवेट अस्पताल ले जाया गया। वहां भी रामचंद्र छत्रपति 21 नवंबर तक रहे। लेकिन फिर भी उनकी डाइंग स्टेटमेंट नहीं करवाई गई। उसी दिन उनका निधन हो गया। अलबत्ता पुलिस रामचंद्र छत्रपति का डाइंग स्टेटमेंट ले लेती, तो न न्याय में देरी होती और न ही इस केस को बेहद लंबी कानूनी प्रक्रिया से गुजरना पड़ता।