पीजीआई ने उन मरीजों को बहुत बड़ी राहत दी है, जो इलाज और अन्य कारणों से अपना रिफंड तय समय में नहीं ले पाते थे या अपने बिल में परिवर्तन करवाना चाहते थे।
संस्थान की नई व्यवस्था के मुताबिक वे रिफंड छह महीने के भीतर ले सकेंगे। पहले यह समय सीमा तीन महीने की थी। पीजीआई के फाइनेंशियल एडवाइजर के प्रस्ताव पर पीजीआई के डायरेक्टर ने मुहर लगा दी है।
पांच दिसंबर से यह व्यवस्था संस्थान में लागू कर दी गई है। पीजीआई की ओर से संबंधित विभागों को निर्देश दिए हैं कि उनके पास टेस्ट के रिफंड और बिल बनवाने के लिए अर्जी देता है तो छह महीने के बाद उसकी एप्लीकेशन न ली जाए।
हालांकि पीजीआई की ओर से मानवीय आधार पर रिफंड पहले भी तीन महीने बाद भी वापस कर दिए जाते थे, लेकिन छह महीने तक विभाग को करना ही होगा। इसके लिए अब आधिकारिक तौर पर निर्देश जारी किए गए हैं।
पीजीआई में बिहार से लेकर जम्मू तक के मरीज आते हैं। सभी टेस्ट की फीस पहले से ही पीजीआई में जमा करा दी जाती है। इलाज के बाद यदि मरीज कोई टेस्ट नहीं कराना चाहता है या फिर किसी गड़बड़ी के कारण ज्यादा रुपये ले लिए तो उसकी फीस तुरंत वापस नहीं की जाती है।
इसके लिए विभागाध्यक्ष और अन्य अथॉरिटी से हस्ताक्षर कराने जरूरी होते थे। जैसा कि पीजीआई में भीड़ काफी ज्यादा रहती थी, ऐसे में लोग बाद में ही आना मुनासिब समझते हैं।
ऐसे में तीन महीने का समय भी कम पड़ जाता था। कई मरीजों ने इसके लिए गुहार भी लगाई थी। इसी को ध्यान में रखकर पीजीआई अथॉरिटी ने मरीजों के रिफंड वापस करने की लिमिट अब छह महीने कर दी है।
बिल परिवर्तन की लिमिट भी छह महीने की
पीजीआई की अथॉरिटी ने बिल परिवर्तन की लिमिट भी अब छह महीने कर दी है। पहले इसकी समय-सीमा तीन महीने की थी। इसके तहत हास्पिटल चार्ज में किसी तरह के संशोधन व चेंज आफ स्टेटस शामिल था।
मान लीजिए यदि किसी मरीज ने पहले पुअर पेशंट सेल से इलाज कराया और बाद में वह अपने इलाज का रुपया भर देता है तो उसके मरीज का स्टेटस बदलना पड़ता था। अब इसकी भी लिमिट छह महीने की कर दी गई है।