न्यू ओपीडी के ग्राउंड फ्लोर पर स्थित बायोकेमेस्ट्री की लैब में गर्मी और भीड़ से स्थिति गंभीर बनती जा रही। आए दिन मरीज बेहोश होकर लैब में गिर रहे हैं। दो दिन पहले भी एक महिला मरीज लैब में बेहोश होकर गिर गई थी।
उससे पहले भी मरीज गिरते रहे हैं। गर्मी की समस्या से निपटने के लिए लैब में एसी फिट होने थे। एसी को खरीदकर लैब के बाहर रखवा दिए हैं, लेकिन पिछले कई दिन वह लैब के बाहर ही पड़े हैं।
रोजाना पीजीआई प्रशासन को इस बारे में अवगत कराया जाता है, लेकिन कोई कदम नहीं उठाया गया है। बढ़ती भीड़ और गर्मी से मरीजों को बुरा हाल हो रहा है। लैब को जनवरी 2014 में बनकर तैयार हो जाना था। दो बार गर्मी का सीजन आकर चला भी गया, लेकिन लैब की स्थिति में कोई सुधार नहीं हुआ।
एक दिन में करीब 700 से अधिक सैंपल
पीजीआई की बायोकेमेस्ट्री लैब में एक दिन में 700 से अधिक सैंपल लिए जाते हैं। अगर छुट्टी पड़ जाए तो अगले दिन 900 से अधिक सैंपल कलेक्ट करने पड़ते हैं। इतनी अधिक संख्या में सैंपल दोपहर 12.30 बजे से पहले लेने पड़ते हैं।
कोई सिस्टम न होने से भीड़ अनियंत्रित हो जाती है। अक्सर भीड़ गेट के बाहर तक पहुंच जाती है। गर्मी और भीड़ से मरीज और लैब टेक्नीशियनों में आए दिन तू-तू-मैं-मैं होती है।
रोजाना 100 मरीजों को लौटना पड़ता है
लैब में एसी का न होना गंभीर समस्या है, लेकिन बड़ी समस्या यह है कि रोजाना 100 से अधिक मरीजों को बिना सैंपल दिए घर लौटना पड़ता है। वजह टेक्नोलॉजिस्ट की कमी।
बायोकेमेस्ट्री, हेमेटोलॉजी व माइक्रोबायोलॉजी के सिर्फ एक-एक टेक्नोलॉजिस्ट हैं, बाकी स्टूडेंट हैं। जिन लोगों के सैंपल नहीं हो पाते, वे अगले दिन आते हैं। ऐसे में हर दिन मरीजों की भीड़ में इजाफा होता जाता है।
लैब में सोशल वर्कर की जरूरत
मरीजों ने बातचीत में बताया कि इतनी भीड़ होती है कि समझ में नहीं आता कि किस लाइन में लगना है। पहले फीस की लाइन, फिर शीशी लेने की लाइन, फिर सैंपल देने की लाइन।
अगर गलती से किसी दूसरी लाइन में लग गए तो इंतजार का दर्द मर्ज से ज्यादा लगने लगता है। ऐसे में पीजीआई प्रशासन को चाहिए कि लैब में एक सोशल वर्कर की नियुक्त करें, जो मरीजों की मदद कर सके।
कोट
हमारी कोशिश है कि इसी हफ्ते लैब में एयरकंडीशनर लगा दिया जाए। लैब को अपग्रेड करने का काम चल रहा है।
-डॉ. अशोक प्रवक्ता पीजीआई
मैं पिछले तीन साल से पीजीआई के डायरेक्टर को लैब की हालत से अवगत करा रहा हूं, लेकिन मुझे नहीं लगता कि पीजीआई प्रशासन ने इन तीन वर्षों में एक भी कदम उठाया हो। ऐसी लापरवाही से मरीजों की परेशानी तो बढ़ती जा रही है, कर्मचारियों का काम करना भी मुश्किल हो रहा है।
-अश्विनी मुंजाल, चेयरमैन, एमटीए पीजीआई।