पीजीआई से बाहर के मरीजों को ले जाने के नाम पर प्राइवेट ट्रांसपोर्टरों की मनमानी वसूली का खेल चौंका देने वाला है। मुश्किल से रोजी-रोटी का जुगाड़ करने वाले मरीजों के लाचार परिजनों से भी हजारों रुपये वसूले जाते थे। वे खून के आंसू रोते थे, लेकिन प्राइवेट ट्रांसपोर्टरों को जरा भी तरस नहीं आता था। रैकेट चलाने के लिए वे दंबगई, नेटवर्किंग और सिक्योरिटी गार्ड का सहारा लेते थे।
हैरान कर देने वाली बात है कि पिछले ढाई साल से यह सब चल रहा था, लेकिन पीजीआई की सिक्योरिटी, सीआईडी, कर्मचारी और पुलिस को इसकी खबर तक नहीं मिली, जबकि एनजीओ के संचालकों ने कई बार पीजीआई डायरेक्टर, मेडिकल सुपरिंटेंडेंट को शिकायत दी। लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई। एक नजर डालते हैं अब तक के पूरे घटनाक्रम पर।
क्या था एंबुलेंस का खेल डेड बॉडी या किसी मरीज को पीजीआई से बाहर ले जाने के लिए एंबुलेंस या गाड़ी की जरूरत पड़ती है। पीजीआई की अपनी कोई ऐसी सेवा नहीं है। इसके लिए उसने माता मनसा देवी सेवक दल, लाइफ लाइन, सेवा भारती, रेडक्रॉस यूटी, पंजाब और हरियाणा की एंबुलेंस को मोर्चरी से मरीज ले जाने की परमिशन दी है। इन सभी एनजीओ की गाड़ियों को पीजीआई के रिसर्च ब्लॉक ए के पीछे खड़ी करने की परमिशन है।
इनके नंबर पीजीआई के रिसेप्शन के पास होते हैं। यदि मरीज रिसेप्शन तक पहुंच गया या फिर उसे एनजीओ की गाड़ियों के नंबर मालूम होते तो इन एंबुलेंस के पास कॉल आ जाती। लेकिन प्राइवेट व फर्जी एंबुलेंस का रैकेट इतना जबरदस्त था कि मरीज के मरने की सूचना एनजीओ के पास पहुंचने के बजाए सीधे प्राइवेट एंबुलेंस संचालकों के पास पहुंचती थी। वे मरीजों के परिजनों की लाचारी का फायदा उठाने लगते। दबाव व हनक बनाने के लिए वे परिजनों को बताते कि पीजीआई ने उन्हें 25 लाख रुपये में ठेका दिया है। उन्हीं की गाड़ियां पीजीआई से बाहर जाएंगी।
25 से 35 रुपये प्रतिकिमी के हिसाब से वसूलते थे
पीजीआई में एंबुलेंस रैकेट: 7 कर्मी गिरफ्तार
- फोटो : amar ujala
प्राइवेट एंबुलेंस मरीज को देखकर अपना रेट बताते थे। यदि मरीज अच्छे घर का है तो उससे वे ज्यादा रुपया वसूलते थे। जानकारी मिली है कि वे परिजनों से 25 से 35 रुपये प्रति किलोमीटर के हिसाब से किराया वसूलते थे, जबकि पीजीआई ने जिन एंबुलेंस को परमिशन दे रखी थी, वे सात रुपये से लेकर नौ रुपये प्रति किलोमीटर के हिसाब से किराया लेती हैं। दबंगई इतनी ज्यादा थी कि वे परिजनों को कहीं भी जाने नहीं देते थे। उन्हें समझाते थे कि वे ही गाड़ी लेकर जाएंगे, दूसरी कोई गाड़ी नहीं आएगी। मन मारकर मरीज के परिजनों को उनके साथ ही जाना पड़ता था।
मरीज की एंबुलेंस रैकेट के पास ऐसे पहुंचती थी सूचना
पुलिस के मुताबिक मरीज के मरने की सूचना के लिए उन्होंने पीजीआई के अंदर एक नेटवर्क बना रखा था। दरअसल जब भी पीजीआई में किसी की मौत होती है तो उसकी बाडी एक बार मोर्चरी जरूर आती है। मोर्चरी तक लाश पहुंचने से पहले बाडी को पैक किया जाता है। इसके लिए पीजीआई का सैनिटेशन विभाग कांट्रैक्ट पर कर्मचारियों को नियुक्त करता है। उन्हें बाडी पैकर्स कहा जाता है।
जैसे ही किसी मरीज की मौत होती तो उसकी सूचना बाडी पैकर्स तक पहुंचती और बाडी पैकर्स उनके साथ घुल मिलकर जानने की कोशिश करते कि बाडी कहां जानी है। इसके अलावा प्राइवेट एंबुलेंस संचालकों के कर्मचारियों का ग्रुप इमरजेंसी, एडवांस ट्रामा सेंटर, मोर्चरी, एडवांस कार्डियक सेंटर और काउंटर नंबर 16 (जहां पर सभी फीस जमा होती हैं) खड़ा होता था। वहां से सूचना मिलते ही प्राइवेट एंबुलेंस तक पहुंचा दी जाती।
पीजीआई सिक्योरिटी विंग के कर्मचारियों की मिल रही थी शह
पीजीआई में एंबुलेंस रैकेट: 7 कर्मी गिरफ्तार
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पीजीआई सिक्योेरिटी विंग को निर्देश हैं कि वे नो पार्किंग में किसी भी वाहन खड़ा नहीं करने देंगे, लेकिन प्राइवेट एंबुलेंस के मुद्दे पर उनकी नीयत बिगड़ गई। एनजीओ की एंबुलेंस की पार्किंग रिसर्च ब्लॉक ए के पास निर्धारित है, लेकिन सिक्योरिटी विंग के कर्मचारियों की शह पर प्राइवेट एंबुलेंस मोर्चरी के पास खड़ी होती थीं। सिक्योरिटी विंग वाले उन्हें न तो हटाते और न ही ड्राइवरों को कुछ बोलते।
पुलिस के कुछ अधिकारियों का कहना है कि इसमें सिक्योरिटी विंग के आला अधिकारियों की भी मिली भगत हो सकती है, क्योंकि इतना बड़ा रैकेट चल रहा हो और उन्हें जानकारी भी न हो। जबकि एनजीओ संचालकों ने कई बार शिकायत दी थी कि प्राइवेट एंबुलेंस मोर्चरी के पास खड़ी होती हैं, जबकि उनकी एंबुलेंस को खड़ा करने की जगह नहीं मिलती। पुलिस अब इस एंगल की भी जांच कर रही है।
पहले मुन्ना गैंग चलाता था, अब मान और सत्ती
एंबुलेंस रैकेट को चलाने के लिए गैंग काम कर रहे थे। पीजीआई सूत्रों से जानकारी मिली है कि आज से ढाई साल पहले सेक्टर 25 का मुन्ना गैंग एंबुलेंस को संचालित करता था। उसी की एंबुलेंस पूरे पीजीआई में चलती थी। सवा साल पहले बाडी पैकर्स का काम करने वाले गगनदीप सिंह मान ने नौकरी छोड़ प्राइवेट एंबुलेंस का काम शुरू कर दिया। उसके साथ सत्ती भी जुड़ गया। दोनों ने मिलकर मुन्ना को पीजीआई से रफा-दफा कर दिया। उसके बाद मान और सत्ती एंबुलेंस संचालित करने लगे। कुछ समय बाद दोनों के बीच भी झगड़ा हो गया, लेकिन बाद में समझौता हो गया। समझौते के तहत मान दिन में अपनी एंबुलेंस भेजेेगा, जबकि सत्ती रात के वक्त।
मचाते थे उत्पात, फिर भी नहीं चेते
बताया जा रहा है कि करीब सात महीने पहले पीजीआई के ट्रामा सेंटर के बाहर मरीज को ले जाने के लिए मुन्ना व मान गैंग के बीच झगड़ा भी हुआ था। कुछ एंबुलेंस के शीशे भी तोड़ दिए गए थे। उस दौरान न तो पीजीआई प्रशासन ने गंभीरता से लिया और न ही स्थानीय पुलिस ने। उसके बाद मान गैंग के गुर्गों ने एक मैकेनिक के पीजीआई में ही हाथ तोड़ दिए। दो महीने पहले भी झगड़ा हुआ था और उसके फलस्वरूप सेक्टर 24 में हवाई फायरिंग भी हुई थी।
ऐसे हुआ एंबुलेंस रैकेट का खुलासा
पीजीआई जांच
दो मई को श्री माता मनसा देवी सेवक दल के ड्राइवरों की ओर से पुलिस को शिकायत दी गई कि कुछ प्राइवेट एंबुलेंस के ड्राइवर उनके साथ मारपीट करते हैं। उनकी एंबुलेंस को खड़ी तक नहीं होने दिया जाता। पुलिस ने अपने दो कर्मियों को सादी वर्दी में भेजा। उन्होंने जांच में पाया कि बड़े स्तर पर गड़बड़ी की जा रही है। इस दौरान एक मरीज के परिजनों ने भी शिकायत दी थी कि एंबुलेंस संचालक उनसे ज्यादा रुपये लिए जा रहे हैं।
उसके बाद तीन कर्मचारियों को पकड़ा गया और एंबुलेंस भी जब्त की गई। अब तक कुल 10 लोगों को गिरफ्तार और 14 एंबुलेंस को जब्त किया जा चुका है। इसमें पीजीआई के सात कर्मचारी है, जबकि तीन एंबुलेंस संचालक। जबकि सत्ती और मान फरार चल रहे हैं। पुलिस ने पहले आईपीसी की धारा 420 के तहत मामला दर्ज किया था, जबकि अब आईपीसी की धारा 382 (जबरदस्ती वसूली) के तहत और धारा 120 बी (साजिश) के तहत परचा दर्ज किया है।
किसका कितना होता था कमीशन
जांच में पता चला है कि सिक्योरिटी गार्ड को किलोमीटर के हिसाब से रुपये मिलते थे, जबकि पैकर्स को 300 से लेकर 400 रुपये तक कमीशन के रूप में मिलते थे। सेक्टर 11 पुलिस थाना इंचार्ज का कहना है कि मोर्चरी से पकड़ा गया विक्की भी लाश को मुफ्त मिलने वाली मेडिकल किट को दो हजार रुपये तक में बेचता था। यह मेडिकल किट लाश को सुरक्षित रखती थी, जिससे बदबू न आए। आर्थिक रूप से कमजोर लोगों को सरकार की ओर से यह मुफ्त में मुहैया करवाइ जाती थी, लेकिन विक्की उसके लिए दो हजार रुपये लेता था।
अब एनजीओ की एंबुलेंस को आ रही हैं कॉल
एनजीओ एंबुलेंस के संचालकों ने बताया कि जब से रैकेट का खुलासा हुआ है, तब से उनके पास काफी कॉल आ रही हैं। पहले एक दिन में एक कॉल मुश्किल से आती थी, लेकिन अब तो बैठने का भी समय नहीं है। दिन में 10-12 कॉले आ जाती हैं। इन एनजीओ की एंबुलेंस में आक्सीजन व मेडिकल किट होती थी, जबकि प्राइवेट संचालकों की गाड़ियों में कुछ भी नहीं होता था। सुरक्षा के लिहाज से वे काफी खतरनाक होती थीं। ये सिर्फमोर्चरी से बाडी नहीं उठाते थे, बल्कि इमरजेंसी व ट्रामा सेंटर से बीमार मरीजों को भी ले जाते थे।
रोजाना 60 से ज्यादा गाड़ियां जाती थीं, रोजाना लाखों का खेल
जांच
- फोटो : demo pics
पुलिस की जांच में पता चला है कि पीजीआई से रोजाना 60 से ज्यादा गाड़ियां बाहर जाती थीं और उनके लिए 20 से लेकर 35 रुपये प्रति किलोमीटर के हिसाब से किराया वसूला जाता था। गैंग लोकल के बजाए हिमाचल, यूपी, पंजाब, हरियाणा और उत्तराखंड के कस्टमर पर फोकस रखते थे। उससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि ये रैकेट रोजाना लाखों में खेल रहा था। इसीलिए बाउंसरों को भी नौकरी पर रखा गया था। पीजीआई के बाहर टैक्सी स्टैंड के मुताबिक उनके एक दिन में 85 से ज्यादा गाड़ियां निकलती थी।
अश्विनी खन्ना, माता मनसा देवी सेवक दल ने बताया कि हमने इस बारे में पीजीआई को सिर्फ यह कहा था कि हमारी गाड़ियों और ड्राइवरों को तंग न किया जाए। इस शिकायत के आधार पर ही पीजीआई को इसमें एक्शन लेना चाहिए था, लेकिन उन्होंने नहीं लिया। बाद में केस कुछ और जाकर बन गया।
एसटीए ने भी बरती लापरवाही
यूटी स्टेट ट्रांसपोर्ट अथॉरिटी की ओर से अगर एबुलेंस की जांच की जाती तो पीजीआई में यह खेल नहीं होता। एंबुलेंस मामले की गड़बड़ी का मामला उछलने के बाद एसटीए की टीम ने चेकिंग कर वर्ष 2016 में कुल सात एबुलेंस का चालान किया। विभाग की दलील है कि पीजीआई प्रशासन की ओर से कभी इस मामले को लेकर शिकायत नहीं दी गई । शहर में 88 एंबुलेंस रजिस्टर्ड हैं।
सरकारी अस्पतालों में नहीं हैं हर्ष वाहन
इसके साथ ही शहर के किसी भी अस्पताल के पास हर्ष वाहन नहीं है। पीजीआई, जीएमसीएच -32 और जनरल हॉस्पिलट -16 में यह व्यवस्था होनी चाहिए, लेकिन इसके लिए कोई बजट तय नहीं किया गया। अगर यह वाहन सभी हॉस्पिटल में हो तो उनका किराया निर्धारित होता और लोगों के साथ ठगी की संभावना कम होती।
राजीव तिवारी, एडिशनल सेक्रेटरी,एसटीए ने बताया कि एसटीए की ओर से पीजीआई सहित सभी सरकारी अस्पतालों की जांच की जा चुकी है। उनकी जांच में इस तरह की गड़बड़ी सामने नहीं आई है। अगर गलत तरीके से एंबुलेंस चलाने वाले पकडे़ गए तो उनकी एंबुलेंस इंपाउंड की जाएंगी। (साथ में इनपुट योगेंद्र त्रिपाठी)