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मनोवैज्ञानिकों के पास आ रही अभिभावकों की कॉल: लाडले को लगी मोबाइल की लत, कैसे छुड़ाएं

Mon, 22 Nov 2021 05:32 PM IST
भूपेंद्र सिंह अमर उजाला ब्यूरो, चंडीगढ़

सार

मनोवैज्ञानिकों ने कहा कि अभिभावकों को गंभीर होना होगा। मोबाइल की लत छुड़ाने के लिए बच्चों को मैदान में खेलने दें और दूसरे प्रयोग भी करें।
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : consumer affairs
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विस्तार
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शिक्षा पा रहे बच्चों को मोबाइल की लत लग रही है। वह स्कूल हो या घर, हर जगह मोबाइल ढूंढते हैं। स्कूल से जैसे ही बच्चे घर पहुंचते हैं वह खाना लेने की बजाय सीधे मोबाइल पर गेम खेल रहे हैं या फिर ऑनलाइन चीजें देख रहे हैं। यदि मोबाइल उन बच्चों को नहीं मिलता है तो उन्हें किसी न किसी चीज की कमी महसूस हो रही है।

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मनोवैज्ञानिक डॉ. रोशनलाल ने इस पर चिंता जताई है, क्योंकि यह लत ऑनलाइन शिक्षा के दौरान अधिक लगी है। ऐसी समस्याओं के साथ कई अभिभावकों की कॉल मनोवैज्ञानिकों के पास आ रही है। अभिभावक भी चिंतित हैं। हालांकि मनोवैज्ञानिकों का तर्क है कि मोबाइल की लत के लिए अभिभावक कम जिम्मेदार नहीं हैं। उन्होंने कहा है कि खुद अभिभावक ही मोबाइल बच्चों के सामने चलाते हैं। बच्चों को मोबाइल की लत से दूर करने के लिए विज्ञानियों ने कहा है कि इसके विकल्प तलाशने होंगे। 

पीयू के मनोविज्ञान विभाग के विशेषज्ञ डॉ. रोशन लाल कहते हैं कि शहरी बच्चे मोबाइल अधिक चलाते हैं। उसके कारण तो कई हैं, लेकिन उनके सामने विकल्प के रूप में खेल मैदान विकसित करने होंगे ताकि वह अपने मस्तिष्क की एनर्जी को वहां खर्च सकें। इसके अलावा माता-पिता बच्चों को एंड्रायड फोन न दें, केवल बात करने के लिए सामान्य फोन उपलब्ध करा दें।
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मनोविज्ञानी एवं नेशनल एसोसिएशन ऑफ साइकोलॉजिकल साइंस के अध्यक्ष डॉ. रोशन लाल ने मोबाइल की लत छुड़ाने के कई तरीके बताए हैं। पीयू समाजशास्त्र विभाग के प्रोफेसर विनोद कुमार चौधरी करते हैं कि बच्चों को यह समझाएं कि मोबाइल सबकुछ नहीं है।

अभिभावक भी बच्चों के सामने मोबाइल का कम प्रयोग करें। इस मोबाइल के जरिये बच्चों की जो एनर्जी खर्च हो रही है, उसे बचाना अभिभावकों का काम है। यह एनर्जी दूसरे कार्यों में लगाई जाए तो उन्हें सफलता पाने में आसानी होगी। 

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इस कारण लगती है मोबाइल की लत
  •  शहरी बच्चों को स्वतंत्रता देते हैं। 
  •  मोबाइल स्टेट्स सिंबल बन गया। इसके कारण बच्चों को अभिभावक महंगे फोन दिला रहे हैं और उसका दूसरे लोगों में प्रचार-प्रसार भी कर रहे हैं।
  •  पीयर प्रेशर भी बन रहा है यानी हीन भावना आ रही है। यदि किसी बच्चे के पास कक्षा में मोबाइल हो और दूसरे के पास नहीं, तो माता-पिता उन्हें भी दिला रहे हैं।
  •  माता-पिता एक बेडरूम में सो रहे हैं। बच्चे दूसरे कमरे में मोबाइल के साथ रातभर खेलते हैं। अभिभावक देखते नहीं कि बच्चे रातभर क्या करते हैं और कितने बजे सो रहे हैं। 
  •  माता-पिता का जॉब में होना भी कारण बन रहा है। बच्चे के पास टाइम पास के लिए या उसकी एनर्जी खर्च के लिए केवल मोबाइल ही एक साधन बचता है।

इन तरीकों को अपनाएं
  •  माता-पिता बच्चों को अधिक से अधिक समय दें। एंड्रॉयड फोन की बजाय उन्हें कॉल करने वाले साधारण फोन उपलब्ध करा सकते हैं।
  •  मोबाइल के विकल्प पैदा करें। शहरों में खेल मैदान बनाएं। बच्चों को उन मैदानों तक पहुंचाएं। 
  •  मोबाइल आदि चलाने का टाइम फिक्स अभिभावक कर दें। हर चीज का टाइम होगा तो लत नहीं लगेगी।
  •  बच्चों को बताएं मोबाइल भविष्य नहीं है। 
  •  बच्चे किशोरावस्था में अधिक एक्सपेरिमेंट करते हैं, इसलिए उस समय बच्चों को मोबाइल न दें। उसके लिए दूसरा रास्ता सुझाएं।
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