पंजाब के दो सबसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों कृषि और इंडस्ट्री की उम्मीदें केंद्रीय वित्तमंत्री अरुण जेटली ने तोड़ दीं। एनडीए-2 का आखिरी बजट इन दोनों क्षेत्रों को कोई ऑक्सीजन नहीं दे सका। किसानों को आस थी कि जेटली कर्ज माफी और किसान-मजदूरों की आत्महत्याओं को रोकने पर खास योजना लेकर आएंगे, पर वित्तमंत्री ने कोई जिक्र ही नहीं किया।
फसलों के रिस्क-कवर पर भी बजट में कुछ नहीं था। उत्पादन लागत से पचास फीसदी ज्यादा एमएसपी और संस्थागत कर्ज 11 लाख करोड़ करने का एलान किसानों को झांसा लग रहा है। ऑपरेशन ग्रीन और पराली की समस्या से निपटने में राज्यों की सहायता के एलान पर भी स्थिति स्पष्ट नहीं है।
उधर, एमएसएमई सेक्टर के एलोकेशन में मामूली बढ़ोतरी की गई है। इस सेक्टर के लिए कोई विशेष घोषणा नहीं की गई। कॉरपोरेट टैक्स में राहत का लाभ बड़े उद्यमियों को होगा। आयकर छूट की सीमा नहीं बढ़ाई गई। इंडस्ट्री को उम्मीद थी कि चीन से आने वाले माल को रोकन को कोई नीति आएगी, पर जेटली मौन रहे।
उत्पादन लागत ही ठीक नहीं, कैसे मिलेंगे भाव?
Budget 2018
- फोटो : अमर उजाला
केंद्र सरकार ने बजट में किसानों को उत्पादन लागत से पचास फीसदी ज्यादा पर एमएसपी तय करने का एलान किया है। लेकिन पंजाब के किसानों के लिए यह एक छलावा है। क्योंकि यहां उत्पादन लागत का आकलन ही गलत किया जा रहा है। ऐसे में किसानों को सही रेट कैसे मिलेंगे।
सीएसीपी फसलों का एमएसपी तय करते समय किसानों की लागत का आकलन करता है। जिसमें जमीन के ठेके से लेकर लेबर और खेतीबाड़ी इनपुट की लागत निकाली जाती है। पंजाब में पिछले साल लागत तय करते समय जमीन का ठेका 13 हजार रुपये प्रति एकड़ लिया गया था। जबकि, मार्केट रेट 40-50 हजार रुपये तक है। कई सालों से यह ठेका रिवाइज ही नहीं किया गया। इसी तरह किसान की लेबर का आकलन दिनों के बजाय घंटों में किया जाता है। यानी किसान ने इस दिन सिर्फ दो घंटे काम किया, किसी और दिन छह घंटे किया या फिर किसी दिन दस घंटे किया।
इस तरह पूरी फसल के दौरान लेबर घंटों में जोड़ कर लागत निकाली जाती है। यहां भी किसानों से धोखा होता है। इसके बाद खाद, कीटनाशक समेत बाकी खेतीबाड़ी इनपुट्स में भी गड़बड़ है। पंजाब के किसानों के साथ एक और समस्या है। यहां 98 फीसदी जमीन सिंचित है। बारिश न होने पर केंद्र सरकार सूखे का मुआवजा नहीं देती। जबकि, ट्यूबवेलों से सिंचाई करने पर किसानों की लागत बढ़ जाती है। इसे भी उत्पादन लागत में नहीं जोड़ा जाता। कमीशन अगले साल के एमएसपी का आकलन एक साल पहले करता है, तब तक कीमतें बढ़ चुकी होती हैं। गेहूं के एमएसपी का एलान नवंबर-17 में हुआ था, तब से डीजल के रेट काफी बढ़ चुके हैं।
जेटली ने किया सारे देश को गुमराह
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जेटली ने किया सारे देश को गुमराह
किसान संगठनों का कहना है कि वित्तमंत्री अरुण जेटली ने सारे देश को गुमराह किया है। जेटली ने सदन में कहा है कि रबी की तरह खरीफ फसलों का एमएसपी भी उत्पादन लागत से पचास फीसदी ज्यादा होगा। जबकि, पिछली धान की फसल में ऐसा नहीं हुआ। भारतीय किसान यूनियन (उगराहां) के महासचिव सुखदेव सिंह कोकरी कलां ने कहा कि 2014 में भाजपा ने स्वामीनाथन रिपोर्ट लागू करने का वादा किया। सत्ता में आने के बाद सुप्रीम कोर्ट में मुकर गई। अब चुनाव देख कर जेटली फिर किसानों को गुमराह कर रहे हैं।
संस्थागत कर्ज से छोटे किसानों को कोई फायदा नहीं
किसान संगठनों का कहना है कि सरकार ने संस्थागत कर्ज की सीमा 11 लाख करोड़ कर दी है। लेकिन इससे छोटे किसानों का कोई फायदा नहीं है। सुखदेव सिंह कोकरी कलां ने कहा कि छोटे किसान या बेजमीने किसानों को इससे कोई लाभ नहीं है। कुछ फीसदी पांच एकड़ तक वाले किसानों को लाभ मिलता है। सरकार ने आढ़तियों और गांव में कम करने वाली कं?पनियों को भी इसमें शामिल कर लिया है, सारा फायदा वे ले जाते हैं। आढ़ती चार फीसदी में कर्ज लेकर किसानों को 18-24 प्रतिशत में देते हैं।
पराली पर साफ नहीं तसवीर
केंद्र सरकार ने पराली की समस्या से निपटने में उत्तरी राज्यों की सहायता का एलान किया है। बजट में इसके लिए खेती मशीनरी पर सब्सिडी देने की बात कही है। लेकिन खेती मशीनरी पर केंद्र सरकार की ओर से पहले ही सब्सिडी दी जा रही है। पंजाब सरकार की दलील थी कि इतनी सब्सिडी के बाद भी मशीनरी खरीदना किसानों के बस की बात नहीं है। इसलिए पूरी राशि ग्रांट-इन-एड के रूप में दी जाए। माहिरों का भी कहना है कि राज्यों के साथ मिल कर केंद्र एग्रो सेंटर खोल कर किसानों को मशीनरी मुहैया करवाए। केंद्रीय बजट में आलू, टमाटर, प्याज की कीमतों में उतार-चढ़ाव के मद्देनजर पांच सौ करोड़ से ऑपरेशन ग्रीन शुरू करने का एलान किया गया है। माहिरों का कहना है कि इसके बजाय प्राइस स्टैबलाइजेशन फंड स्थापित किया जाना चाहिए था। जिसमें या तो सरकार किसानों से उत्पाद खुद खरीदे या फिर उन्हें मुआवजा दे।