चंडीगढ़। छोटे बच्चों में होने वाला अर्ली चाइल्डहुड ग्लूकोमा अब तक आंखों की सबसे जटिल और चुनौतीपूर्ण बीमारियों में शामिल रहा है। इसकी सही पहचान के लिए बच्चों को बेहोश करना पड़ता था और इसके बावजूद कई बार बीमारी स्पष्ट नहीं हो पाती थी लेकिन अब पीजीआई के एडवांस आई सेंटर ने एक अत्याधुनिक तकनीक अपनाकर इस चुनौती को काफी हद तक आसान कर दिया है। नई तकनीक की मदद से अब बिना दर्द, बिना एनेस्थीसिया और कुछ ही सेकेंड में बच्चों में ग्लूकोमा की सटीक पहचान संभव हो गई है। विशेषज्ञों का कहना है कि यह तकनीक बच्चों में ग्लूकोमा की जांच और इलाज की दिशा में एक बड़ी उपलब्धि है, जिससे समय रहते आंखों की रोशनी बचाई जा सकेगी।
पीजीआई में स्वेप्ट-सोर्स एंटीरियर सेगमेंट ऑप्टिकल कोहेरेंस टोमोग्राफी (एसएस-एएस ओसीटी) तकनीक का इस्तेमाल किया जा रहा है। इस तकनीक की खासियत यह है कि इसमें बच्चे की आंख को छुआ तक नहीं जाता और न ही उसे बेहोश करने की जरूरत पड़ती है। जांच के दौरान बच्चे को माता-पिता की गोद में या स्ट्रेचर पर लिटाकर कुछ सेकेंड के लिए सिर स्थिर रखा जाता है, जिसे ‘फ्लाइंग बेबी तकनीक’ कहा जाता है। इसके बाद इन्फ्रारेड रोशनी के जरिए आंख के आगे के हिस्से की हाई-रेजोल्यूशन स्कैनिंग की जाती है। पूरी प्रक्रिया महज दो से तीन सेकेंड में पूरी हो जाती है।
पीजीआई के डॉक्टरों ने इस तकनीक पर गहन शोध किया है और पहली बार इसे दो साल से कम उम्र के बच्चों में एक इन-ऑफिस बायोमार्कर यानी डायग्नोस्टिक टूल के रूप में वैज्ञानिक रूप से परखा गया है। यह शोध प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय जर्नल जामा ऑपथैल्मोलॉजी में प्रकाशित हुआ है। शोध टीम में डॉ. एसएस पांडव, डॉ. सुष्मिता कौशिक, डॉ. अशोक कुमार सिंह, डॉ. फैसल थत्तरथोडी, डॉ. व्यशाक सुरेश, आंचल गेरा और शिवांगी यादव शामिल रहे। विशेषज्ञों के अनुसार यह तकनीक भविष्य में बच्चों की आंखों से जुड़ी अन्य जटिल बीमारियों की पहचान में भी कारगर साबित हो सकती है।
पहले की जांच थी जटिल और जोखिम भरी
अब तक छोटे बच्चों में ग्लूकोमा की पहचान मुख्य रूप से लक्षणों के आधार पर की जाती थी। आंखों का असामान्य रूप से बड़ा दिखना, अधिक आंसू आना और रोशनी से चुभन जैसे संकेतों के बाद सटीक जांच के लिए बच्चों को एनेस्थीसिया देकर ऑपरेशन थिएटर में ले जाना पड़ता था। वहां आंखों का दबाव मापना, गोनियोस्कोपी और ऑप्टिक नर्व की जांच जैसी प्रक्रियाएं की जाती थीं। यह न केवल जोखिम भरा था बल्कि समय लेने वाला भी था। कई बार कॉर्निया धुंधला होने के कारण सही निष्कर्ष निकालना मुश्किल हो जाता था।
अब न दर्द, न बेहोशी, न जटिलता
नई तकनीक से डॉक्टर आंख के उस हिस्से को सीधे देख पाते हैं जहां से आंख का तरल बाहर निकलता है जिसे ट्रैबेक्युलर मेशवर्क कहा जाता है। शोध में पाया गया कि जिन बच्चों में ग्लूकोमा नहीं था, उनमें 100 प्रतिशत मामलों में ट्रैबेक्युलर मेशवर्क साफ दिखाई दी जबकि ग्लूकोमा से पीड़ित बच्चों में यह संरचना अधिकांश मामलों में स्पष्ट नहीं थी। इस तरह दो से तीन सेकेंड में ही बीमारी की सटीक पहचान संभव हो गई है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह तकनीक बच्चों के नेत्र उपचार में क्रांतिकारी बदलाव ला सकती है।