हरियाणा और पंजाब के किसानों के लिए अच्छी खबर है। अब हिमाचल के पहाड़ों पर मिलने वाली मशरूम को गेहूं और गन्ने के भूसे से तैयार किया जाएगा। भूसे से कल्टीवेशन के बाद तैयार मशरूम की क्वालिटी और वैरायटी पहले से बेहतर होगी। इसे दिल की बीमारी, डायबिटिज और मोटापे के इलाज में प्रयोग किया जा सकेगा। किसानों को भूसे का पैसा तो मिलेगा ही साथ में मशरूम के लिए भूसे की कमी भी दूर होगी। बिना ज्यादा जगह और लागत के आमदनी दो से तीन गुना तक होगी।
हिमाचल प्रदेश यूनिवर्सिटी शिमला के प्रोफेसर अनंत सागर का कहना है कि मशरूम में प्रोटीन, विटामिन, मिनरल्स और फाइबर्स होते हैं। ये दिल के बीमारियों के अलावा मोटापा कम करने और डायबिटिज के रोगियों के लिए मुफीद हैं। मशरूम ज्यादातर पहाड़ों पर होती है और पैदावार बहुत कम है। ऐसे में इसका उत्पादन और वैरायटी बढ़ाने के लिए कल्टीवेशन प्रोजेक्ट शुरू किया गया है। इसके लिए यूजीसी ने 12 लाख रुपये का अनुदान भी दिया है।
यूं होगा कल्टीवेशन
प्रोफेसर अनंत ने बताया कि मशरूम को गेहूं के दानों पर डाल कर पहले बीज बनाया जाता है। 15 किलो मशरूम तैयार करने के लिए 10 किलो गेहूं को उबालकर कर उस पर मशरूम का पाउडर डाला जाता है। 3 माह में गेहूं बीज के रूप में आ जाता है। गेहूं और गन्ने के भूसे से तैयार 10 किलो कम्पोज में 10 ग्राम बीज डाले जाते हैं।
इस मिश्रण को 25 दिनों के लिए एक पॉलीथिन में पैक करके 25 डिग्री तापमान में अंधेरे में रखा जाता है। 25 दिन बाद इस पैक को खोल कर हवादार कमरे में 25 दिन और रखा जाएगा। इससे मशरूम अंकुरित होना शुरू हो जाएंगे।