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चांद की चाल से खेती बन रही फायदे का सौदा

Mon, 12 May 2014 01:08 AM IST
नरेश कुमार बातिश/अमर उजाला ब्यूरो, पटियाला
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चांद पृथ्वीवासियों के लिये हमेशा से ही आकर्षण का केंद्र रहा है। चांद की मूवमेंट सिर्फ राशियों व मानवीय भाग्य से ही जुड़ी हुई नहीं है। यह मूवमेंट धरती पर उगाए जाने वाली फसलों, सब्जियों, फूलों और फलों को भी प्रभावित करती है।
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समय के साथ भले ही यह सिस्टम देश में गुम हो चुका है, लेकिन अब भी ऐसे किसान हैं जो चंद्र की दशा और दिशा दोनों देखकर ही खेती कर रहे हैं। उनका मानना है कि इसका फायदा उन्हें ज्यादा उत्पादन और स्वस्थ खेती के रूप में मिल रहा है।

इंटरनेशनल एनजीओ बायोडायानामिक आउटरीच इंटरनेशनल नामक एनजीओ चांद की चाल के अनुसार एक कैलेंडर तैयार कर किसानों और बागान मालिकों तक पहुंचाने का काम कर रही है।
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चांद और शनि आमने-सामने तो बिजाई अच्छी

परंपरागत खेती पंचांग के मुताबिक बिजाई का वह समय सबसे बेहतर होता है जब शनि ग्रह और चांद बिल्कुल आमने-सामने होते हैं। इसके अलावा यह भी माना जाता है कि पूर्णिमा से 48 घंटे पहले की गई बिजाई भी फसल के लिए अच्छी रहती है।

वहीं इस सिस्टम के अनुसार उन दिनों में तो बिजाई बिल्कुल नहीं करनी चाहिए, जिन दिनों में चांद धरती से दूर होता है। शनि चांद के आमने-सामने की स्थिति में फसल कीटों व बीमारियों से भी मुक्त रहती है।

चांद उत्तरायण की स्थिति में हो तो जड़ों वाली फसल को छोड़कर फसल काटनी चाहिए। वहीं चंद्र दक्षिणायण की स्थिति में हो तो खेत की तैयारी करनी चाहिए। खाद डाला जाना चाहिए, पौधों और चारे की कटाई की जानी चाहिए।

फिर लौट रहा है परंपरागत सिस्टम

जानकारों के मुताबिक सैकड़ों साल पहले देश भर के किसान चांद की मूवमेंट के हिसाब से ही खेती और बागवानी किया करते थे। लेकिन पेस्टिसाइड्स और तेजी से नतीजे हासिल करने की इच्छा ने इन सब बातों को गुम कर दिया।

खेती विरासत एनजीओ के निर्देशक सुरिंदर सिंह का कहना है कि इस परंपरागत सिस्टम को फिर किसानों तक पहुंचाने में बायोडायनामिक आउटरीज संस्था ने बेहतरीन रोल अदा किया है।

इस विषय पर लंबे समय से काम कर रहे न्यूजीलैंड के माहिर पीटर प्रॉक्टर ने भी भारत में काफी संख्या में किसानों को आर्गेनिक खेती और इस कैलेंडर के बारे में जानकारी दी थी। उन्होंने भी इसको सीखा और आगे किसानों तक पहुंचाया है।

किसान उपजा रहे स्वास्थ्यवर्धक अनाज

जालंधर में नकोदर के पास गांव मूसेवाल निवासी किसान जसपाल सिंह चट्ठा बताते हैं कि उन्हें इस पद्धति से खेती करते काफी साल हो गए हैं। यह आर्गेनिक खेती है जो धरती का उपजाऊपन बचाती है और स्वास्थ्यवर्धक अनाज पैदा करती है।

यह पद्धति भारत से निकली और विदेशों से लौटकर यहीं वापस आ रही है। उन्हें उतना ही उत्पादन मिल रहा है जितना किसान महंगी यूरिया का उपयोग कर हासिल कर रहा है। पटियाला के गांव सहौली के किसान इंद्रजीत सिंह भी आर्गेनिक खेती कर रहे हैं।

वे कहते हैं कि इसलिए उन्होंने खेती को पूरी तरह परंपरागत सिस्टम से किया है। चांद की मूवमेंट का खेती के साथ संबंध पता चला था तो उन्होंने इसे लागू किया और इसका काफी फायदा भी हुआ।
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जागरूक कर रही एक संस्था

बायोडायनमिक एसोसिएशन ऑफ इंडिया देश भर के आर्गेनिक से जुड़े किसानों का ऐसा संगठन है जिसके जरिये किसानों को आर्गेनिक खेती और परंपरागत रुप से स्वास्थवर्धक तरीकों से अनाज पैदा करने के बारे में विभिन्न तरीकों से जागरूक कर रही है।

इस संगठन में सात बोर्ड सदस्य और 55 स्थायी सदस्य हैं। जिसमें सीजेयकरन अध्यक्ष और लुक्स डेंगल सचिव हैं। जिसकी शुरुआत तमिलनाडु से की गई थी।

ऑस्ट्रेलिया की बायोडायनामिक आउटरीज के डायरेक्टर पीटर प्रॉक्टर ने काफी समय तक देश के विभिन्न हिस्सों में जाकर किसानों को जागरूक किया। उन्होंने कुछ साल पहले उत्तराखंड में विशेष ट्रेनिंग भी आयोजित की। जिसमें पंजाब की तरफ से हिस्सा लेने वाले पहले किसान जालंधर के जसपाल सिंह चट्ठा थे।
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