प्राचीन कला केंद्र में पद्मभूषण बिरजू महाराज की याद में आयोजित कार्यक्रम में प्रस्तुति देते उनक
- फोटो : CHANDIGARH
चंडीगढ़। प्राचीन कला केंद्र के एमएल कौसर सभागार में कभी कथक और भरतनाट्यम की जुगलबंदी पर तालियों की गड़गड़ाहट गूंज रही थी तो कभी राग बहार पर आधारित त्रिवट की प्रस्तुति पर। मौका था प्राचीन कला केंद्र की 272वीं मासिक बैठक का, जिसमें शाम को एमएल कौसर सभागार में एक विशेष नृत्य संध्या का आयोजन किया गया। कार्यक्रम द्वारा पंडित बिरजू महाराज परंपरा ने समरांजलि के माध्यम से पंडित बिरजू महाराज को भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की। इस अवसर पर बिरजू महाराज के सुपुत्र, पौत्र और पौत्र वधू ने प्रस्तुति देकर दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया। गौरतलब है कि बिरजू महाराज को केंद्र द्वारा 2011 में गुरू एमएल कौसर अवार्ड से नवाजा गया था।
कार्यक्रम का आरंभ त्रिभुवन महाराज द्वारा एकल प्रस्तुति शिव स्तुति से किया गया, जिसमें उन्होंने भगवान शिव के सुंदर रूप का वर्णन नृत्य के माध्यम से किया। ब्रज ताल पर आधारित पौने पांच मात्रा में एक रचना पर कत्थक प्रस्तुत किया गया। इसके बाद तीन ताल में पारंपरिक कथक नृत्य पेश किया गया। इनके साथ मंच पर राहुल विश्वकर्मा ने तबले पर, जयवर्द्धन दधीच ने गायन पर और जनाब वारिस खान ने सारंगी पर संगत की। इसके बाद रजनी महाराज द्वारा भरतनाट्यम में तकनीकी पक्ष पर आधारित तिल्लाना पेश किया गया। कार्यक्रम के अगले भाग में तीन युवा कलाकारों राहुल मोंगा, शैलजा पंचकस एवं तरण गर्ग द्वारा त्रिवट पेश किया गया जो राग बहार पर आधारित था। इसके बाद त्रिभुवन महाराज और रजनी महाराज द्वारा भरतनाट्यम और कथक की सुंदर जुगलबंदी पेश की गई। जाति आरोहन नामक प्रस्तुति में दोनों ने बेहद खूबसूरती से नृत्य, भाव और कला का प्रदर्शन करके दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया। कार्यक्रम के अंत में जयकिशन महाराज द्वारा बैठकी भाव प्रस्तुति किया गया, जिसमें कालका बिंदादीन महाराज एवं इस घराने की कुछ खास बंदिशों पर बैठकी भाव प्रस्तुत करके खूब तालियां बटोरीं। इनके साथ मंच पर राहुल विश्वकर्मा ने तबले पर, जयवर्द्धन दधीच ने गायन पर और जनबा वारिस खान ने सांरगी पर संगत की। कार्यक्रम के अंत में केंद्र की रजिस्ट्रार डॉ. शोभा कौसर ने कलाकारों को पुष्प देकर सम्मानित किया।