स्कूल की दूरी मेरे घर से सात मील (11.26 किमी) थी। उस समय घड़ी नहीं होती थी तो सुबह गांव से जब मुल्तान की ट्रेन जाती तब अपने दोस्त साहिब के साथ मैं स्कूल के लिए निकलता था। घर आते समय बहुत तेज धूप होती थी, इसलिए मैं सात मील नंगे पांव भागकर ही आता था।
स्कूल से घर आने में लगभग दो घंटे लगते थे। स्कूल समय में ही खूब दौड़ लगाई थी। नए स्कूल में अंग्रेजी उबाऊ विषय था। मेरे पिता को अंग्रेजी नहीं आती थी लेकिन वे खुश थे क्योंकि मैं अंग्रेजी पढ़ रहा था। रोजाना शाम को वे मुझे किताब पढ़कर सुनाने को बोलते और मैं रोजाना एक ही पैराग्राफ पढ़ देता था, क्योंकि मुझे लगता था उन्हें कौन सी अंग्रेजी आती है।
बंटवारे के दौरान 15 अगस्त 1947 को पिता ने पहली बार बोला ‘भाग मिल्खा भाग’
विभाजन की घोषणा के बाद 15 अगस्त 1947 की आधी रात को गांव गोबिंदपुरा में उपद्रव मच गया, मुस्लिम सिखों और हिंदुओं को मार रहे थे। सुबह लगभग 4 बजे का समय था, जब मेरे घर भी हाहाकार मच गया था, घर की सारी औरतों को गुरुद्वारे में पनाह दिलवाई गई थी। मेरे पिता लाठी और तलवारों से ही बचाव करने में लगे थे।
मैं इधर से उधर जान बचाते छिप रहा था और अपने पिता को हमारे लिए लड़ते देख रहा था। तभी अचानक मैंने देखा कि वो धराशायी हो गए और चिल्लाए ‘भाग मिल्खा भाग’। मैं सहम गया और मुश्किल से ही हिल पा रहा था। तभी मुझे पता चला कि पास के गुरुद्वारे में जहां मेरी मां को रखा गया था, उसे आग लगा दी गई है। मेरे भाई दौलत और आमिर ने अपनी पत्नियों और बेटियों का कत्ल कर दिया, जिससे उन्हें गलत हाथों से बचाया जा सके।
मेरी एक बहन हूंडी अपनी एक साल की बेटी को लेकर वहां से जिंदा भाग निकली थी। मेरे दिमाग में सिर्फ ‘भाग मिल्खा भाग’ घूम रहा था। मैं पता नहीं कब कोट अड्डू रेलवे स्टेशन पहुंचा, लहूलुहान हालत में स्टेशन पर मैं मुल्तान के लिए ट्रेन में बैठा। जहां मेरे फौजी भाई की पत्नी आर्मी बैरक में रह रही थी।
बहन ने जेल से छुड़ाने के लिए बेची थी बालियां, 1960 ओलंपिक मैच से पहले लौटाईं
मेरी एक बहन ईशर दिल्ली में अपने ससुराल वालों के पास रहती थी। एक बार मैं वर्ष 1948 में शहादरा से दिल्ली की लोकल ट्रेन में बिना टिकट पकड़ा गया। हालांकि इससे पहले मैंने हमेशा बिना टिकट ही चोरी छिपे सफर किया था। इसके बाद मुझे मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया गया।
मुझे तीन महीने की जेल या 15 रुपये के जुर्माने की सजा मिली। मेरे पार कौड़ी भी नहीं थी, इसलिए मुझे तीन माह के लिए जेल में डाल दिया गया। कुछ दिन बाद मैंने ईशर को इसका संदेश पहुंचाया, उसने मुझे रिहा करवाने के लिए अपनी सोने की बालियां बेच दीं। हालांकि ससुराल में उसकी हालत अच्छी थी।
इसके बाद पहली बार मेरे परिवार का कोई सदस्य (मेरी बहन ईशर) वर्ष 1960 में रोम ओलंपिक से पहले दिल्ली स्टेडियम में मुझे भागते हुए देखने के लिए आई, इससे पहले उसने मेरे बारे में सिर्फ लोगों से सुना था। उसने मुझे कहा ‘तू धीरे भागा कर, तू बेहोश हो जाता है’ यह कहकर वह रोने लगी। उसे नहीं पता था कि उस दिन उसके लिए मैंने सरप्राइज रखा था। मैंने उसे अपना इंडिया लिखा कोट पहनाया और कहा जेब में हाथ डालकर दिखाओ। मैंने दोनों जेब में सोने की बालियां रखी थीं और वो बस लगातार रोए जा रही थी।