चंडीगढ़। इंसान का जीवन जीने के लिए होता है, आत्महत्या करने के लिए नहीं। चुनौतियां जिंदगी का हिस्सा हैं। उनका डटकर मुकाबला करें। संघर्ष करना ही जीवन है। संघर्ष से ही सफलताएं मिलती हैं। यह बात ‘विश्व आत्महत्या रोकथाम दिवस’ पर आयोजित ऑनलाइन संगोष्ठी में विशेषज्ञों ने कही। यह गोष्ठी शुक्रवार को पंजाब यूनिवर्सिटी के मनोविज्ञान विभाग, पुलिस प्रशासन और जेल विभाग व चंडीगढ़ प्रशासन ने संयुक्त रूप से आयोजित की थी। इस दौरान मनोविज्ञान विभाग के अध्यक्ष डॉ. रोशन लाल ने सभी का स्वागत करते हुए संगोष्ठी पर प्रकाश डाला।
युवाओं में आत्महत्याओं का बढ़ता ग्राफ चिंता का विषय : डीजीपी
चंडीगढ़ के डीजीपी प्रवीर रंजन ने संगोष्ठी का शुभारंभ करते हुए कहा कि युवाओं में आत्महत्या की घटनाएं बढ़ रही हैं। आज के युवा कॅरिअर, शिक्षा और जीवन के प्रति चल रही अनिश्चितता के मामले में बहुत ही अजीबोगरीब चुनौतियों का सामना कर रहे हैं। युवाओं को समझाने की जरूरत है। उन्होंने अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़ों को सामने करते हुए कहा कि आत्महत्याओं का ग्राफ बढ़ता जा रहा है। युवा अधिक असुरक्षित हैं और यह एक गंभीर चिंता का विषय है। आत्महत्या की रोकथाम के लिए बहुत सारी हेल्प लाइन काम कर रही हैं, फिर भी संख्या बढ़ ती जा रही है। हमें आत्महत्या को रोकने के लिए मौजूदा सिस्टम के बारे में जानकारी होनी चाहिए। अंत में उन्होंने कहा कि जीवन चुनौतियों और दर्द से भरा है जो बहुत अस्थायी हैं। जीवन में चुनौतियां सामना करने के लिए आती हैं।
माता-पिता के अलावा शिक्षकों का भावनात्मक लगाव कम न हो : एडीजी जेल
इस मौके पर जेल विभाग के एडीजी ओमवीर सिंह ने कहा कि माता-पिता के अलावा शिक्षकों का भावनात्मक लगाव बच्चों के साथ होना जरूरी है। वह उनकी हर चीज को नोटिस कर समस्या का समाधान करें। चाहे वह कॅरिअर का हो या फिर कोई अन्य। मनोविज्ञानियों व मनोचिकित्सकों की भी आज समाज को जरूरत है। उन्होंने कहा कि आत्महत्या को रोकने के लिए आधुनिक व तेजी से आगे बढ़ता जीवन, गतिहीन जीवन शैली और परिवार के साथ पीढ़ी के अंतर को देखना होगा।
स्कूल-कॉलेजों के पाठ्यक्रमों में प्रशिक्षण की जरूरत : डॉ. दलीप सिंह
पूर्व आईएएस डॉ. दलीप सिंह ने मुख्य भाषण दिया और समकालीन अनिश्चितता में भावनात्मक बुद्धिमत्ता की बहुत महत्वपूर्ण भूमिका पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि आत्महत्या का कारण नकारात्मक भावनाएं होती है। जब इंसान भावनात्मक रूप से कमजोर और तनाव सहने की क्षमता कम हो जाती है तो वह गलत कदम उठा सकता है। उन्होंने कहा कि जीवन की बाधाओं का सामना करने के लिए लोगों को मानसिक रूप से प्रशिक्षित करने के लिए सरकार को स्कूल और कॉलेज स्तर पर पाठ्यक्रम में शामिल करने के लिए तंत्र विकसित करना चाहिए।
शिक्षा, मीडिया की सकारात्मक भूमिका जरूरी : डॉ. दिनेश
लेडी हार्डिंग मेडिकल कॉलेज के मनोचिकित्सा विभाग के प्रोफेसर और प्रमुख डॉ. दिनेश कटारिया ने कहा कि आत्महत्या रोकथाम के लिए शिक्षा, मीडिया की सकारात्मक भूमिका, सामाजिक कलंक को दूर करना, स्क्रीनिंग, मूल्यांकन की उपलब्धता, सामाजिक जागरूकता जरूरी है। मानसिक स्वास्थ्य को शारीरिक स्वास्थ्य के समान ही महत्वपूर्ण माना जाना चाहिए। पीयू के मनोविज्ञान विभाग के अध्यक्ष डॉ. रोशन लाल ने कहा कि हम जीने के लिए पैदा हुए हैं, न जाने के लिए। उन्होंने सभी का आभार जताया। इस दौरान कई विदेशी वक्ताओं ने भी विचार रखे।