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पंजाब की सत्ता बदल सकते हैं डेरों के समर्थक

Fri, 11 Apr 2014 01:22 PM IST
अखिल तलवार/अमर उजाला, चंडीगढ़
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पंजाब की सियासत पर धार्मिक डेरों का खासा प्रभाव माना जाता है। डेरों के समर्थकों की तादाद सियासी दलों के लिए एक बड़ा वोट बैंक है। डेरे पंजाब की कई सीटों पर हार-जीत तय करने की ताकत रखते हैं। 9000 के लगभग डेरे हैं पंजाब में। 300 डेरे इनमें से प्रमुख हैं। 12 डेरों के समर्थकों की संख्या लाखों में है।
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ऐसे में सभी सियासी पार्टियों के नेता खुले तौर पर या गुपचुप इन डेरों के शरण में जाते रहे हैं। इस लोकसभा चुनाव में भी डेरों का समर्थन अहम भूमिका निभाएगा। यह चाहे पार्टियों को मिले या उम्मीदवारों को। आमतौर पर डेरा प्रमुख समर्थन के बारे में कोई खुला ऐलान नहीं करते, बल्कि मतदान से ऐन पहले सिर्फ इशारा ही देते हैं।

पहले से ही रहा है प्रभाव
पंजाब की सियासत में डेरों का प्रभाव नया नहीं है। शुरुआत में ही मास्टर तारा सिंह और संत फतेह सिंह की अगुवाई में अकाली लीडरशिप एसजीपीसी और विभिन्न गुरुद्वारों से जुड़े थे। अकाली नेता जगीर कौर का अपना डेरा है। जनसंघ और बाद में भाजपा आर्य समाज व अन्य हिंदू संगठनों से जुड़े रहे। तथाकथित कांग्रेस भी इसमें पीछे नहीं थी। बाबू मंगू राम की ओर से चलाए गए आद-धर्म आंदोलन से कांग्रेसी दिज्गज मास्टर गुरबंता सिंह जुड़े।
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आर्थिक, सामाजिक भेदभाव के कारण डेरों का विस्तार

समाजशास्त्रियों का मानना है कि पंजाब में आर्थिक व सामाजिक तौर पर भेदभाव के चलते ही डेरे फले-फूले। समाज में सम्मानजनक स्थान नहीं मिलने से दलित, पिछड़े और गरीब वर्गों के लोग डेरों से जुड़ते गए।

एक स्टडी के मुताबिक पंजाब में छोटे-बड़े, सिख और गैर सिख नौ हजार डेरे हैं। इनमें करीब तीन सौ प्रमुख डेरे हैं, जिनका प्रभाव पंजाब ही नहीं, आसपास के इलाकों में भी है। इनमें से सबसे बड़े बारह डेरे ऐसे हैं जिनके समर्थकों की संख्या लाखों में है।

इनमें राधास्वामी, सच्चा सौदा, निरंकारी, नामधारी, दिव्य ज्योति जागृति संस्थान, डेरा संत भनियारावाला, डेरा सचखंड, डेरा बेगोवाल आदि शामिल हैं। सभी जिलों में इनकी शाखाएं हैं, जमीनें हैं। कई डेरे तो देश के विभिन्न हिस्सों से लेकर विदेशों में भी जड़ें जमा चुके हैं।

इस तरह बढ़ा डेरों का प्रभाव

रिसर्च स्कॉलर प्रो. जगरूप सिंह के शब्दों में डेरों ने अपने समर्थकों को सुरक्षा की भावना दी। डेरे में आने के बाद उन्हें एहसास होता है कि वे एक समुदाय का हिस्सा हैं। डेरा सभी का है, यहां कोई उन्हें परेशान नहीं कर सकता। डेरों की अपनी आइडियोलॉजी है, पर धर्म या जाति का बंधन नहीं है। सिख, हिंदू या मुस्लिम कोई भी किसी डेरे का अनुयायी बन सकता है। उसे अपनी मूल पहचान छोड़ने की जरूरत नहीं है।

समाजशास्त्रियों के मुताबिक डेरों के समाज भलाई कार्यों से भी इनका प्रभाव बढ़ा। पंजाब नशों की समस्या से जूझ रहा है। डेरों में शराब व अन्य नशों के खिलाफ फरमान जारी किया जाता है। बड़ी संख्या में लोगों ने नाम लेने के बाद नशे छोड़ दिए। डेरों ने अपने शिक्षण व सेहत संस्थान स्थापित किए। गरीब और दलित वर्गों के बच्चों को पढ़ाई के लिए प्रोत्साहित किया।

विवादों से रहा नाता
बहुत से डेरों का विवादों से नाता रहा है। सच्चा सौदा के प्रमुख संत गुरमीत राम रहीम द्वारा श्री गुरु गोबिंद सिंह जी की वेशभूषा में अपने समर्थकों को जाम-ए-इंसां पिलाने के बाद काफी विवाद हुआ था। संत प्यारा सिंह भनियारा वाले को धार्मिक भावनाएं आहत करने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था। वहीं, डेरा सचखंड, बल्लां के प्रमुख संत निरंजन दास पर विएना में हमला हुआ, जिसमें उनके सहयोगी संत रामानंद दास की मौत हो गई। इसके बाद दोआबा में ऐसी आग भड़की कि दो दिन तक तांडव चलता रहा।

डेरा सच्चा सौदा

सिरसा स्थित डेरा सच्चा सौदा के अनुयायियों की तादाद करीब चार करोड़ मानी जाती है। जो कि पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, उत्तर प्रदेश व दिल्ली में हैं। डेरा प्रमुख संत गुरमीत राम रहीम पर कई संगीन मामलों की सुनवाई अदालत में चल रही है।

पंजाब की सियासत के गढ़ मालवा की 35 सीटों पर डेरे का काफी प्रभाव है। कहा जाता है कि 2007 में डेरे ने कांग्रेस को समर्थन किया, जिसके बूते पार्टी ने मालवा में शानदार जीत दर्ज की।

कांग्रेस नेता हरमिंदर जस्सी संत गुरमीत राम रहीम के करीबी रिश्तेदार भी हैं। कहा जाता है कि 2009 लोकसभा चुनाव में शिअद ने बठिंडा सीट पर हरसिमरत कौर बादल को जिताने के लिए डेरे का समर्थन हासिल कर लिया था। जिन्होंने कैप्टन अमरिंदर सिंह के बेटे रणइंदर सिंह को भारी अंतर से हराया।

राधास्वामी

ब्यास स्थित राधास्वामी डेरे का दोआबा और माझा क्षेत्रों में मजबूत आधार है। पंजाब ही नहीं, कई राज्यों से लेकर विदेशों तक में डेरे के समर्थक फैले हुए हैं। पंजाब ही नहीं, हिमाचल प्रदेश और हरियाणा में सभी जिलों में इनके सत्संग घर बने हुए हैं।

बाबा जरनैल सिंह जी ने 1891 में डेरे की स्थापना की थी। यह डेरा हमेशा से सियासत से दूर रहा। समर्थकों की बड़ी तादाद के बावजूद डेरा चुनावों पर हमेशा मौन रहा। पर फिर भी कहीं न कहीं यह कांग्रेस के लिए मददगार कहा जाता था।

होशियारपुर से कांग्रेस उम्मीदवार मोहिंदर सिंह केपी भी इस डेरे के समर्थक हैं। पर 2012 में कुछ कारणों से डेरे के संबंध अकालियों से भी जुड़ गए। कैबिनेट मंत्री बिक्रम सिंह मजीठिया की पत्नी डेरे के पूर्व प्रमुख चरन सिंह के परिवार से हैं।

डेरा सचखंड

जालंधर के पास बल्लां स्थित डेरा सचखंड रविदास बिरदारी का सबसे महत्वपूर्ण स्थान है। बिरादरी के सभी फैसले यहीं से होते हैं। डेरे ने वाराणसी में गुरु रविदास जी के जन्मस्थान पर धार्मिक स्थल का निर्माण कराया है। हर साल रविदास जयंती से बड़ी तादाद में श्रद्धालुओं को वाराणसी ले जाया जाता है। डेरे का दोआबा में खासा प्रभाव है।

इसके अलावा जहां भी रविदास बिरदारी के लोग ज्यादा हैं, वहां डेरे का प्रभाव भी है। डेरा हमेशा से शांतिप्रिय रहा है। पर 2009 में विएना में डेरा प्रमुख संत निरंजन दास जी पर हमला हुआ। जिसमें उनके निकटतम सहयोगी संत रामानंद दास जी की मौत हो गई।

उसके बाद डेरा समर्थकों ने जालंधर और आसपास के इलाकों में जम कर तांडव किया। डेरे ने किसी खास पार्टी के बजाय बिरादरी के उम्मीदवारों को तरजीह दी है।
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दिव्य ज्योति जागृति संस्थान

जालंधर के पास नूरमहल स्थित संस्थान का प्रभाव पंजाब ही नहीं, देश के कई हिस्सों में है। विदेशों में भी इसकी शाखाएं हैं। संस्थान की ओर से कई समाजसेवी कार्य किए जाते हैं। जेलों में कैदियों के लिए भी संस्थान की ओर से प्रोजेक्ट चलाया जा रहा है।

यह संस्थान और इसके प्रमुख आशुतोष महाराज हमेशा से कट्टरपंथियों के निशाने पर रहे हैं। लुधियाना में संस्थान के कार्यक्रम को लेकर काफी विवाद हुआ था।

कांग्रेस और भाजपा नेता हमेशा से यहां हाजिरी लगाते रहे हैं। इस बार संस्थान अलग स्थिति से गुजर रहा है। क्योंकि आशुतोष महाराज पिछले कई दिनों से गहन समाधि में हैं।
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