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CourageInKargil: कर्नल राजेश शर्मा ने बताए हालात- हमारा एक जवान दस-दस पाकिस्तानी सैनिकों पर था भारी

Sun, 26 Jul 2020 02:27 PM IST
ajay kumar अरविंद बाजपेयी, अमर उजाला, चंडीगढ़

सार

  • घाटी की हर हलचल की सूचना हेडक्वार्टर तक पहुंचाना कम चुनौतीपूर्ण नहीं था
  • मोर्चे पर डटे सेना के जवानों की चिंता में दिन रात मुश्किल से कटते थे
  • लेह में तैनाती थी, इंटेलीजेंस में दक्षता के कारण सूचनाएं जुटाने का जिम्मा मिला
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राजेश शर्मा, कर्नल (रिटा.)
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विस्तार
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कारगिल में डटे हमारे जवान पाकिस्तान की मंसूबों को नेस्तनाबूद कर रहे थे। भारत माता की जयकारों के साथ बलिदान की ऐसी कहानियां लिख रहे थे, जो युगों युगों तक हमें प्रेरणा देने के लिए काफी थीं। बुजुर्ग मांओं के नौजवान बेटे हंसते-हंसते सीने पर गोलियां खा रहे थे। 22 दिन चले इस युद्ध में शहीद हुए जवानों को याद कर आंखें आज भी नम हो जाती हैं लेकिन उन रणबांकुरों का शौर्य हमारे सीने को गर्व से चौड़ा भी कर देता है।

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चंडीगढ़ में रह रहे कर्नल (रिटा.) राजेश शर्मा की आंखों में आज भी कारगिल की यादें ताजा हैं। राजेश लेह में तैनात थे। उन्होंने बताया कि युद्ध कई मोर्चों पर लड़ा जाता है। फ्रंट पर जवान लोहा लेते हैं तो इंटेलीजेंस विंग खुफिया सूचनाएं जुटाकर दुश्मन की कमजोरियों का पता लगाती है। मेरा 15 साल का लंबा अनुभव कश्मीर के अलग-अलग हिस्सों में तैनाती का था। इसलिए इंटेलीजेंस ऑपरेशन की जिम्मेदारी मुझे दी गई। यह काम बहुत चुनौतीपूर्ण होता है। हर पल आपको चौकन्ना रहना होता है। हर छोटी से छोटी हलचल पर आपको नजर रखनी होती है। हमारी टीम ने इस काम को बखूबी अंजाम दिया।


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राजेश शर्मा बताते हैं कि कश्मीर वैली में आतंकवादी ऑपरेशन के दौरान ज्यादा इंटेलीजेंस की आवश्यकता होती थी। हमें कारगिल में सेना और हेडक्वार्टर के बीच संपर्क बनाकर रखना होता था। राजेश का कहना है कि हमारा एक एक जवान पाकिस्तान के दस-दस सैनिकों पर भारी था। कारगिल से पाकिस्तान को सबक मिला कि सीधे युद्ध में वह हमसे नहीं जीत सकता। इसलिए वह आतंकवादियों और घुसपैठियों की मदद से भारत को नुकसान पहुंचाने की साजिश रचता है।

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चीन से ज्यादा सावधान रहने की जरूरत

एलएसी पर तनावपूर्ण माहौल के बारे में राजेश कहते हैं कि कारगिल युद्ध में सीमा तो थी परंतु पाकिस्तानी फौज ने यहां जबरदस्ती कब्जा किया था। चीन के साथ समस्या यह है कि वहां बार्डर तय नहीं है। हमको यहां ज्यादा चौकन्ना रहना होगा। कारगिल के समय न तो साउथ ग्लेशियर को खोला गया, न ही जम्मू से लगते सेक्टर को खोला गया था। चीन के साथ मसला दूसरा है। 

चीन ने जिस प्रकार से डोकलाम और गलवां में हरकतें कीं हैं, उससे उसके ऊपर विश्वास नहीं किया जा सकता। चीन से हमें चौकन्ना उसके पड़ोसी कनेक्शन की वजह से भी रहने की आवश्यकता है। हां, एक बात यह जरूर है कि चीन जानता है कि यह 1962 का भारत नहीं है। चीन की एक हरकत पर यदि भारत ने जवाब दिया तो बीजिंग तक कहर बरपेगा।
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