अर्शदीप ने दुकानों पर होने वाले खर्च से कम लागत में खेत में उगा लीं ताजा फल और सब्जियां
सेक्टर-48 निवासी अर्शदीप (38) ने पर्यावरण को बचाने के लिए नजीर पेश की है। विदेशों में रिसर्च करने बाद अर्शदीप को लगा कि केमिकलयुक्त सब्जी और फल खाने से लोगों की सेहत पर विपरीत प्रभाव पड़ रहा है। उन्होंने भारत लौटकर यहां के हालातों का जायजा लिया। उन्होंने जॉर्जिया में रिसर्च वैज्ञानिक के रूप में इस विषय पर अध्ययन किया। इसके बाद पूरे साल में अपने परिवार का राशन, अन्न, सब्जी व फल का खर्चा निकाला। इस अनुमान के अनुसार होशियारपुर में एक एकड़ भूमि पर जैविक खेती के माध्यम से एक साल तक अनाज, फल और सब्जी उगाई। उनके शोध के अनुसार चार लोगों का परिवार एक साल में बाजार से इतना सामान खरीदने में लगभग डेढ़ लाख रुपये खर्च करता है जबकि 90 हजार रुपये में जैविक खेती से इतना सामान उगाकर उपयोग किया जा सकता है। अर्शदीप ने बताया कि उन्नत खेती का सबसे अच्छा उदाहरण आज कोरिया, ऑस्ट्रेलिया और इजराइल हैं। वहां कम पानी, बिना बिजली और रसायनों के बेहतर खेती होती है। रिसर्च के दौरान यहां से काफी कुछ सीखने को मिला। जैविक खेती को लेकर अर्शदीप ने एक किताब लिखी है, जिसमें उन्होंने इस तरह की खेती एक ओर किसानों की आय बढ़ाती है, दूसरी ओर हमें शुद्ध खाद्यान्न उपलब्ध कराती है।
अनुभव सब पर हावी... रिटायरमेंट के बाद करम सिंह ने उठा ली पर्यावरण को बचाने की जिम्मेदारी
सेक्टर-125 मोहाली निवासी करम सिंह की उम्र 80 साल होने के बावजूद पर्यावरण के प्रति प्रेम कम नहीं हुआ है। बागवानी में एमएससी करने के बाद पर्यावरण को लेकर करम सिंह में जज्बा जागा। नौकरी में फुर्सत नहीं मिली तो रिटायरमेंट के बाद वह अपने स्तर पर पौधे उगाकर लोगों को बांटना शुरू किया। इसके लिए कई जगह जमीन की मांग की, लेकिन कहीं भूमि नहीं मिली जहां वह पौधे उगाकर लोगों को निशुल्क बांट सकें। छोटे स्तर पर शुरू हुआ काम एक निजी कंपनी को पसंद आया। उन्होंने कहा कि आप हमारे यहां पौधे उगाएं। करम सिंह ने काम शुरू किया, लेकिन लागत ज्यादा आने के कारण कंपनी ने लोगों को निशुल्क पौधे देने से मना कर दिया। करम सिंह ने निर्णय लिया कि अब खुद की भूमि खरीदकर वहां पौधे उगाएंगे और लोगों को निशुल्क देंगे। छोटे स्तर पर ही उन्होंने अब तक एक लाख पौधे लोगों को बांट दिए हैं। इसके अलावा एक संस्था को हर साल 50 हजार पौधे निशुल्क देकर पंजाब के विभिन्न जिलों में लगवाते हैं। साथ ही उनकी देखरेख के लिए समय समय पर जाते हैं। करम सिंह अपने अनुभव को लोगों से साझा करने के लिए ज्यादा से ज्यादा कार्यशालाओं में भाग लेते हैं।