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नोट पकड़वाना या बहाना, कहीं ये किसी की चाल तो नहीं, देखें ये ब्लॉग

Thu, 01 Dec 2016 09:43 AM IST
सुधीर राघव
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इंडियन करेंसी
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लाखों रुपये के पुराने नोट पकड़े जाने की खबर हो या गंगा में नोट बहाने की। इसके पीछे की असलियत आखिर क्या हो सकती है, देखिए ये ब्लॉग। ये नोट सिर्फ इसलिए फैंके और दिखाए जा रहे हैं ताकि मोदी जनता को मुंह दिखाने के काबिल हो सकें।
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यहां पढ़िए पूरा ब्लॉग: गरीब और किसान ही निशाने पर

यह सर्जीकल स्ट्राइक गरीबों और किसानों पर हुआ है। यह बिल्कुल वैसा है जैसा जैविक हथियारों का शोर मचाकर अमेरिका ने पर हमला किया था मगर मिला कुछ नहीं। सिर्फ जनता तबाह हुई। सिर्फ गरीब मार हुई है। बैंकों की लाइन में और पैसे के अभाव में करीब साठ लोगों की जान जा चुकी है।

वही मूर्खता मोदी सरकार ने की है। कालेधन का शोर मचाकर गरीबों और किसानों पर कार्पेट बंबारमेंट की गई है। गरीब और किसान रोटी को मोहताज है। सरकार की साख खत्म है। गरीब अपनी साख से ही उधार पर जी पा रहा है। किसी बड़े उद्योगपति को नहीं पकड़ा गया।
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नवंबर महीने में नोटबंदी किसानों के खिलाफ

नोटबंदी
मोदी को 14 लाख का सूट देने वाले मोदीभक्त ने मोदी जी की इज्जत बचाने के लिए दो सौ फीसदी जुर्माने पर जरूर कुछ करोड़ जमा कराए हैं। इस तरह भक्त और पार्टीजन ही नोट इकट्ठे कर सार्वजनिक स्थलों पर अपने पास ही पकड़वा रहे हैं। महाराष्ट्र का मंत्री तक पार्टी ने इस काम में लगा दिया है।

नोटबंदी के लिए इसलिए नवंबर का समय चुना गया ताकि किसान अपनी मुख्य रबी की फसल ही न बो सकें। उनके पास भूखे मरने और अपनी जमीने बेचने के अलावा और कोई विकल्प न बचे। सीमा पार वाले तो सारे मोदी के फैन हो चुके हैं।

नोटबंदी की ऐसी योजना तो कोई लाहौर में बैठे आकाओं के चरण छूकर ही बना सकता है, जिससे पूरे भारत में उत्पादन ठप हो जाए और देश आर्थिक एमरजेंसी की गर्त में चला जाए। खुश आतंकियों ने अपनी गतिविधियां रोक दी हैं। भारत को बरबाद करने के लिए मोदी ही काफी हैं तो उन्हें मेहनत करने की क्या जरूरत।
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नोटबंदी के पीछे क्या है सरकार की प्लानिंग

नोट बैन
इस बार गरीब किसान रबी की फसल न बो सकें, क्या इसकी तैयारी सरकार की ओर से 6 महीने से चल रही थी? क्या नोटबंदी के पीछे सरकार का प्लान यह है कि गरीब किसान नवंबर में अगर कुछ बोयेगा नहीं तो अप्रैल में कुछ कटेगा भी नहीं?

क्या इसलिए सहकारी बैंकों पर पुराने नोट न लेने कि बंदिश लगा दी गई है? क्या अगले साल हालात यह होने वाले हैं की भूखा मरता किसान जमीन बेचने को मजबूर होगा? क्या इसलिए ही आजकल कई बाबाओं और उद्योग पतियों के चेहरे पर पहले से कहीं ज्यादा रौनक है?

ये सब अगले साल उस वक्त का इंतजार कर रहे हैं, जब किसान मजबूर होकर जमीने बेचेगा तब ये गिद्धों की तरह मंडराते हुए पहुंच जाएंगे और उनकी जमीने औने-पौने फोन दाम पर खरीदकर उद्योग लगाएंगे। क्या यही है सरकार का भारत निर्माण? मैक इन इंडिया?
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