ट्रायल कोर्ट ने एफआईआर के बाद बनाए प्रमाणपत्र को वैध मानने से किया था इनकार
आदेश के खिलाफ अपील मंजूर करते हुए हाईकोर्ट ने सुनाया आदेश
चंडीगढ़। पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने अहम फैसला सुनाते हुए यह स्पष्ट कर दिया कि यदि यह साबित नहीं होता कि जन्म प्रमाण पत्र में कोई गड़बड़ी है तो प्राथमिकी दर्ज होने के बाद जारी होेने पर भी यह वैध है। रोहतक की ट्रायल कोर्ट ने जन्म प्रमाण पत्र को स्वीकार करने से इन्कार करते हुए कहा था कि यह प्राथमिकी दर्ज होने के बाद जारी किया था।
याची ने बताया कि पोक्सो एक्ट में दर्ज एफआईआर में उसने उत्तर प्रदेश के स्वार रामपुर में पंचायत राज विभाग के एडीओ की ओर से जारी जन्म प्रमाण पत्र सहित विभिन्न दस्तावेजों के आधार पर उसे किशोर घोषित करने के लिए ट्रायल कोर्ट के समक्ष एक आवेदन दायर किया था। 2019 में रोहतक की कोर्ट ने यह कहते हुए याचिका को खारिज कर दिया कि जन्म प्रमाण पत्र एफआईआर दर्ज होने के बाद तैयार किया था, इसलिए यह मुकदमे के निर्णय को प्रभावित कर सकता है। याचिकाकर्ता के वकील ने तर्क दिया कि तय प्रक्रिया के तहत सक्षम अधिकारी ने प्रमाणपत्र जारी किया है और इसे स्वीकार किया जाना चाहिए। याचिकाकर्ता की जन्मतिथि की पुष्टि स्कूल प्रमाण पत्र से भी होती है, जो एफआईआर दर्ज होने से काफी पहले याचिकाकर्ता के पिता की ओर से प्रस्तुत हलफनामे के आधार पर तैयार किया था। हाईकोर्ट ने कहा कि अपराध के समय याची किशोर था एहतिहात किया जाना सबसे महत्वपूर्ण है। वर्तमान मामले में हाईकोर्ट ने पाया कि प्रमाणपत्र के अनुसार याची की जन्मतिथि 10 अक्तूबर 2001 थी। प्रमाण पत्र प्राथमिकी दर्ज होने के बाद तैयार किया था, लेकिन ऐसा कुछ भी रिकॉर्ड में नहीं लाया, जिससे पता चले कि इसकी सामग्री में कोई गड़बड़ी है या हेरफेर किया है। ऐसे में हाईकोर्ट ने उसे अपराध के समय नाबालिग मानने का आदेश दिया है।