पंजाब विधानसभा चुनाव 2017 के मद्देनजर बठिंडा शहरी सीट का प्रभाव ऐसा है कि जो उम्मीदवार यहां से जीतता है, सरकार बनने पर मंत्री बनता है। यहां के वोटरों ने हर बार हिंदू नेता पर ही ज्यादा भरोसा जताया है। इसी के चलते कांग्रेस ने 1957 से लेकर 2012 तक सिर्फ दो बार किसी सिख नेता को बठिंडा शहरी से चुनाव मैदान में उतारा।
इसमें एक बार उसे जीत नसीब हुई है। इस साल तीसरी बार कांग्रेस ने गैर हिंदू नेता मनप्रीत बादल को मैदान में उतारा है। दूसरी तरफ अकाली दल ने सरूप चंद सिंगला और आम आदमी पार्टी ने दीपक बांसल पर दांव लगाया है। पिछले छह दशकों में बठिंडा सीट से कांग्रेस ने सात बार, आजाद ने एक बार, अकाली दल ने चार बार और जनता दल के उम्मीदवारों ने एक बार जीत हासिल की है।
यहां से दो ही बार सरकार विरोधी पार्टी का उम्मीदवार जीतने में कामयाब रहा है। 2007 तक बठिंडा के साथ लगते गांव भी पहले शहर में आते थे लेकिन चुनाव आयोग की तरफ से 2012 से पहले एक नियम के तहत बठिंडा से गांव काटकर बठिंडा शहरी हलका बना दिया गया था।
छह दशकों में बठिंडा सीट से जीते उमीदवार
पंजाब विस चुनाव
- फोटो : File Photo
1957 में कांग्रेस के हरबंस लाल, 1967 में आजाद उम्मीदवार फकीर चंद, 1969 में अकाली दल के तेजा सिंह, 1972 में कांग्रेस के केशो राम, 1977 में जनता दल के हितविलाषी, 1980 में कांग्रेस के सुरिंदर सिंह, 1985 में अकाली दल के कस्तूरी लाल, 1992 में कांग्रेस के सुरिंदर कपूर, 1997 में अकाली दल के चिरंजी लाल, 2002 में कांग्रेस के सुरिंदर सिंगला, 2007 में कांग्रेस के हरमंदर जस्सी और 2012 के विस चुनाव में अकाली दल के सरूप चंद सिंगला जीते।
अकाली सरकार ने तेजा सिंह को 1969 में, 1972 में कांग्रेस ने केशो राम को, 1985 में अकाली सरकार ने कस्तूरी लाल को, 1992 में कांग्रेस ने सुरिंदर कपूर को, 1997 में अकाली दल ने चिरंजी लाल को, 2002 में कांग्रेस ने सुरिंदर सिंगला को मंत्री बनाया गया था। 2012 में जब शहरी सीट से अकाली सरूप चंद सिंगला जीते थे तो उनको प्रदेश सरकार में मुख्य संसदीय सचिव बना दिया गया।
शहरी सीट के कुल 1,83,813 वोट
पुरुष 97279
महिला 86534