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‘अंकल सरकार कहती है बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ, क्या मैं बेटी नहीं हूं’

Sat, 02 Apr 2016 06:46 PM IST
राजेश शांडिल्य/अमर उजाला, पिंजौर(पंचकूला)
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एचएमटी पिंजौर कर्मचारी की बेटी - फोटो : फाइल फोटो
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अंकल सरकार कहती है कि ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ तो क्या मैं बेटी नहीं हूं। क्या एचएमटी में काम करने वाले 1500 कर्मचारियों के घरों में बेटियां नहीं है। इस सरकारी उपक्रम में काम करने वाले कर्मचारियों के परिवार का गुजरा कैसे हो रहा है। उनकी बेटियां कैसे पढ़ रही हैं। क्योंकि इन बेटियों के पिता को पिछले 20 महीने से वेतन नहीं मिला है।
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ये टीस उस बेटी की है, जिसने छह माह पहले ही अपनी मां को खो दिया। पिता जय सिंह एचएमटी में पिछले करीब 23 वर्षों से कार्यरत हैं। उनकी दो बेटियां हैं। रेनू बीएससी द्वितीय वर्ष और छोटी बेटी नेहा 12 वीं की छात्रा। दोनों बेटियां पिता की आर्थिक परेशानी को भली प्रकार समझती हैं।

इनका कहना है कि कठिनाई के इस दौर में वह अपना गुजरा कैसे कर रही है वह ही जानती हैं। जब नेहा से बात की तो उसने बताया कि बेहतर इलाज न मिलने के कारण उसकी मां स्वर्ग सिधार गईं।  पिता के हाथ में पैसा न होने की वजह से मां का अच्छा इलाज नहीं हो सका। पिता ने एचएमटी में इलाज के लिए डिमांड भेजी थी, लेकिन इलाज के लिए पैसा मंजूर नहीं हो सका। बता दें कि नेहा की माता मां संतोष देवी की 8 अक्तूबर 2015 को इलाज के दौरान मौत हो गई थी। 
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  नेहा की मानें तो उसकी मां की मौत का कारण कोई रोग नहीं, बल्कि एचएमटी से कोई सहयोग न मिलना था। उन्होंने सवाल उठाया कि क्या सरकार को नहीं पता कि ऐेसे हालातों में बेटियों का पालन पोषण और उनकी पढ़ाई कैसे होगी।   उल्लेखनीय है कि छह माह पहले संतोष देवी की मौत की तरह दो दिन पहले ही एचएमटी वर्कर धर्मपाल की मौत भी ऐसे ही हालात में हुई थी। फिलहाल लाचार सरकार से आस लगाए बैठे हैं कि उनकी सैलरी कब रिलीज होगी और एचएमटी को जिंदा रखने के लिए केंद्र सरकार से कैसे आक्सीजन मिलेगी। 
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