सावन का महीना भगवान शिव का प्रिय मास है। सभी शिवालयों में भगवान का अभिषेक हो रहा है। चंडीगढ़ में एक खास शिवालय है, जहां पर हर रोज भगवान भोलेनाथ का जलाभिषेक कुएं के जल से होता है। सेक्टर-24 के प्राचीन शिव मंदिर (शिवालय खेमपुरी) में प्राचीन कुआं है। मंदिर प्रबंधन ने इसे संरक्षित किया है। इस कुआं में कोई गंदगी न जाए, इसके लिए उसे ऊपर से ढक कर रखा है। चारों तरफ जाली भी लगाई गई है।
खेमपुरी के शिवलिंग स्वयंभू हैं। यह मंदिर बहुत प्राचीन है। कभी यह कैलड़ गांव होता था। चंडीगढ़ के बसने से पहले यहां पर शिवालय था। यहां पर भारी संख्या में भक्त दूर-दूर से जलाभिषेक के लिए पहुंचते हैं। शिवालय खेमपुरी के प्रबंधक गोबिंद हरि ने बताया कि मंदिर परिसर में बहुत पुराना कुआं है। कुएं के जल को संरक्षित किया गया है। गोबिंद हरि के अनुसार कुएं का पानी पूरी तरह से शुद्ध है। हर साल इसके जल को जांच के लिए लैब में भेजा जाता है। रोज कुएं की पूजा होती है। मंदिर परिसर और उसके बाहर बेल के पौधे लगाए गए हैं।
मंदिर को संचालित करने वाली संस्था श्री सनातन धर्म मंदिर सभा के प्रधान अश्वनी ऋषि और प्रबंधक गोबिंद हरि ने बताया कि सावन में पूजा के लिए शिवालय में अभिषेक के लिए कई लोगों ने बुकिंग कराई है। शाम में भगवान शिव का शृंगार होता है। उन्होंने बताया कि मंदिर में शिवालय के अलावा राम परिवार, श्री लक्ष्मी नारायण, शीतला माता, सरस्वती माता, संतोषी माता की प्रतिमा भी है। मंदिर में प्राचीन त्रिवेणी (बरगद, पीपल और नीम) का पेड़ है। इनकी रोज पूजा होती है।
सेक्टर-8 मंदिर में हर रोज पार्थिव शिवलिंग की होती है पूजा
सेक्टर- 8 स्थित प्राचीन शिव मंदिर में हर रोज पार्थिव शिवलिंग की पूजा होती है। यह पार्थिव शिवलिंग दीमक वाली मिट्टी और साधारण चिकनी मिट्टी से तैयार किया जाता है। मान्यता है कि पार्थिव शिवलिंग की पूजा से मनोवांछित फल की प्राप्ति होती है। हर रोज पूजा के बाद पार्थिव शिवलिंग को प्रवाहित किया जाता है। यह कहना है सेक्टर- 8 के प्राचीन शिव मंदिर के प्रमुख पुजारी पंडित अयोध्या प्रसाद शास्त्री का। उन्होंने कहा कि यह मंदिर बहुत प्राचीन है। मंदिर के शिवालय में नर्मदेश्वर शिवलिंग स्थापित हैं।
मंदिर का संचालन श्री सनातन धर्म मंदिर सभा की ओर होता है। सभा के प्रधान एचएस लक्की ने बताया कि सेक्टर- 8 के प्राचीन शिव मंदिर का इतिहास चंडीगढ़ के बनने से पहले का है। जहां मंदिर है, यह जगह पहले कालीबड़ गांव के नाम से जानी जाती थी। चंडीगढ़ के बसने पर गांव के लोगों को दूसरी जगह पर बसा दिया गया, लेकिन मंदिर उसी जगह पर विद्यमान है। यहां पर वर्ष 1952 से मंदिर है। मंदिर में 1960 से कीर्तन होना शुरू हुआ। पहले छोटे से कच्चे कमरे में शिवलिंग था। अब आलीशान मंदिर है।
1971 में हुआ मंदिर का पुनर्निर्माण
मंदिर कमेटी के प्रधान एचएस लक्की बताते हैं कि मंदिर में 10 कमरे हैं, जिसमें यात्री और संतों के ठहरने की व्यवस्था है। अधिकतर कांच से काम किया गया है, जिसमें देवी देवताओं की लीलाओं को बेहतरीन तरीके से प्रस्तुत किया गया है। मंदिर का भवन वातानुकूलित है। उन्होंने कहा कि मंदिर का पुनर्निर्माण 1971 में महाशिवरात्रि पर्व पर किया गया था। मंदिर में त्रिवेणी पेड़ भी बहुत प्राचीन है।
एचएस लक्की बताया कि मंदिर में हर रोज मंत्री, विधायक, जज और बड़े-बड़े उद्योगपति पूजा करने के लिए आते हैं। सावन के सभी सोमवार को खीर और मालपुए का प्रसाद बांटा जाता है। मंदिर में शिवालय के अलावा श्री राधा-कृष्ण, सीता, राम, लक्ष्मण, दुर्गा माता, भैरो जी, हनुमानजी, शनिदेव, लक्ष्मी नारायण, संतोषी माता की प्रतिमाएं स्थापित की गई हैं।