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#हिंदीहैंहमः हिंदी में सुनना, बोलना और समझना आसान, यह दुनिया की एकमात्र वैज्ञानिक भाषा

Mon, 14 Sep 2020 03:30 PM IST
खुशबू गोयल अमर उजाला, हिसार
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वेबिनार में शामिल हुए विशेषज्ञ। - फोटो : अमर उजाला
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हिंदी भाषा के प्रोत्साहन को लेकर अमर उजाला के हिंदी हैं हम अभियान के तहत रविवार को एक वेबिनार का आयोजन किया गया। हिंदी को व्यावहारिक भाषा कैसे बनाएं, विषय पर आयोजित वेबिनार में विशेषज्ञों ने हिंदी भाषा के प्रोत्साहन को लेकर अपने सुझाव दिए। वक्ताओं ने कहा कि हिंदी दुनिया की एकमात्र वैज्ञानिक भाषा है और दुनिया भर के लोग हिंदी को पढ़ना चाहते हैं, लेकिन भारत में व्यावहारिक तौर पर हिंदी पिछड़ गई है। हमें अपने घर, शिक्षण संस्थानों, कार्यस्थलों और कार्यालयों में हर जगह हिंदी को बढ़ावा देना होगा। इसके लिए सभी को मिलकर काम करने की आवश्यकता है। हिंदी भाषा में सुनना, समझना, ग्रहण करना सब कुछ आसान होता है।

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पिछले 10 साल में हिंदी का प्रचलन बढ़ा है और अब तो दक्षिण भारत के राज्यों में हिंदी राजनीतिक मुद्दा बनने लगा है। कहने का अर्थ है कि लोगों की सोच में बदलाव आ रहा है। हिंदी में 11 स्वर और 33 व्यंजन हैं, जिनकी संरचना खूबसूरती से वैज्ञानिक ढंग से की गई है। बोलते हैं तो हमारी मांसपेशियां कैसे काम करती हैं, इसका भी ध्यान रखा गया है।

हिंदी का खूबसूरती का अंदाजा इस बात से लगा सकते हैं कि हमें कितनी ही अंग्रेजी आती हो, लेकिन हम समाचारों को हिंदी में ही अधिक पढ़ना और सुनना पसंद करते हैं। एक बात यह भी है कि हम अपनी भाषा में दूसरी भाषाओं के शब्दों को मिलाते जा रहे हैं, जबकि दूसरे देशों में संस्कृत-हिंदी जैसी भाषाओं पर शोध हो रहे हैं। वहां संस्कृत विद्यालय खुल रहे हैं। हमारे यहां के शिक्षण संस्थान संचालकों से अनुरोध करूंगा कि अपने संस्थानों को ऐसा न बनाएं कि बच्चों को लगे कि अंग्रेजी बोलकर ही आगे जा सकते हैं। हम हिंदी भाषा के साथ भी कामयाब हो सकते हैं। - प्रो. कुलदीप आर्य, निदेशक, इंपीरियल कॉलेज हिसार।

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आमतौर पर माना जाता है कि हिंदी भाषा में रोजगार नहीं है। यदि आरंभ से ही विद्यार्थियों को हिंदी भाषा में रोजगार की जानकारी दी जाए तो निश्चित रूप से विद्यार्थियों में हिंदी के प्रति प्रेमभाव को बढ़ाया जा सकता है। हिंदी भाषा रोजगार का सृजन करती है। छात्र हिंदी के गद्य और पद्य को जान लेंगे और उनमें पारंगत हो जाएंगे तो उनके लिए रोजगार के कई रास्ते खुले हैं।

केवल साहित्यिक तौर पर बात करें तो गद्य के तहत विद्यार्थी कहानी, आत्मकथा, निबंध, नाटक, लघु कथा आदि के लेखन का नियमित अभ्यास करे और उनके लेखकों को पढ़े तो वे लेखक के तौर पर कामयाब हो सकते हैं। पद्य के तहत विद्यार्थी दोहा, कविता, चौपाई, गीत आदि लिख सकते हैं। तो इन चीजों की विद्यार्थियों को विद्यालय जीवन में ही पहचान हो जानी चाहिए। - डॉ. अशोक कुमार, प्राध्यापक, राजकीय कन्या वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय, मंडी आदमपुर

हिंदी सिर्फ हमारी मातृभाषा नहीं, बल्कि देश का स्वाभिमान भी है। हर देशवासी को हिंदी भाषा को ज्यादा से ज्यादा बढ़ावा देना चाहिए। हिंदी सिर्फ भारत में ही नहीं, बल्कि विदेशों में भी काफी बोली जाती है। इसके जरिए ही हम अपने विचारों को बड़े ही सहज ढंग से अभिव्यक्त कर पाते हैं। मगर हमारे दिमाग में कई भ्रांतियां है कि अगर किसी व्यक्ति को अंग्रेजी भाषा का ज्ञान है तो वह ज्यादा बुद्धिमान है।

ऐसा नहीं है, अंग्रेजी केवल भाषा है और जरूरी नहीं कि अंग्रेजी भाषी व्यक्ति के पास हिंदी भाषी व्यक्ति से अधिक ज्ञान हो। भाषाएं भावों को अभिव्यक्त करने का जरिया है, बौद्धिक स्तर को मापने का नहीं। ऐसे में हिंदी भाषा में शिक्षा को बढ़ावा देना चाहिए। अच्छी बात ये है कि नई शिक्षा नीति से भी हिंदी भाषा को बढ़ावा मिलेगा और प्राथमिक कक्षा तक पढ़ाई अपनी मातृभाषा में ही होगी। - डॉ. मनोज कुमार, सहायक प्राध्यापक, राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय, हिसार

हिंदी को व्यावहारिक बनाने के लिए जरूरी है कि घरों में हम बच्चों को हिंदी भाषा के प्रति प्रेरित करें। हमें उनके अंग्रेजी बोलने पर गर्व करना बंद करके हिंदी बोलने पर गर्व करना होगा। उन्हें हिंदी बोलने व उसका महत्व बताने का काम भी हमारा है। अगर हम सब घरों से हिंदी को प्रोत्साहन देना शुरू करें तो हम आसानी से हिंदी को सिरमौर बना सकते हैं।

सरकार हर वर्ष कहती है कि कार्यालयों में कार्य या पत्राचार हिंदी में हो, लेकिन धरातल पर ऐसा कुछ नहीं होता। विवि द्वारा भेजी जाने वाली अधिसूचना अगर हिंदी में होगी तो विद्यार्थी इसे आसानी से समझ सकेंगे। हिंदी के प्रचार के लिए केवल एक दिन नहीं, बल्कि वर्ष भर कार्यक्रम चलते रहने चाहिए। सरकारी भी हिंदी में बेहतर करने वाले विद्यार्थियों के लिए कोई स्कॉलरशिप का प्रावधान करे। - प्रो. सत्य सुरेंद्र सिंगला, निदेशक, इंपीरियल कॉलेज
 
हिंदी के प्रोत्साहन के लिए सभी को मिलकर काम करना होगा। जरूरी है कि वर्ष भर हिंदी से संबंधित प्रतियोगिताएं, संगोष्ठियां होती रहनी चाहिए। समाचार पत्र व इससे जुड़े लोग महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। हर कार्यालय हिंदी पखवाड़े पर काम करता है। किसी हिंदीभाषी अखबार से जुड़कर प्रतियोगिताएं या कार्यक्रम हों तो हिंदी को इसका बड़ा फायदा होगा। सरकार हिंदी में बनने वाले नाटकों, कार्यक्रमों, भजन, गीतों को दक्षिण और पूर्वी भारत में प्रसार करें। हमारे यहां के कला के लोगों को वहां भेजा जाए, क्योंकि देश की एकता और अखंडता बनाए रखने के लिए पूरे देश में एक ही भाषा का बोला और समझा जाना आवश्यक है। - लोकेश मोहन खट्टर, रंगकर्मी

सभ्यताओं के साथ भाषाओं का भी विकास होता है और हमारी हिंदी भाषा आरंभ से ही संस्कारों की भाषा के रूप में जानी गई। हमें युवाओं और बच्चों को हिंदी के महत्व के बारे में बताने की आवश्यकता है। हिंदी के माध्यम से संस्कार, संस्कृति, विचार, भाव सब कुछ अभिव्यक्त किया जा सकता है।

हम अपने बच्चों को अंग्रेजी स्कूलों में दाखिला करवाकर अहसास करवाते हैं कि अंग्रेजी से ही व्यक्तित्व विकास होता है। वे अंग्रेजी में कविता सुनाते हैं तो हम उसे गौरव मानते हैं। ये सब हिंदी की वर्तमान दशा के कारण हैं। हमें उन्हें बताना होगा कि व्यक्तित्व विकास के लिए अंग्रेजी की जरूरत नहीं है। वह केवल भाषा है। व्यक्तित्व विकास वाली भाषा तो सही मायने में हिंदी और हिंदी साहित्य हैं। हमें भी बच्चों के हिंदी बोलने पर गर्व करना होगा। - डॉ. सुनीता बामल, हिंदी विभागाध्यक्ष, राजकीय महाविद्यालय, नलवा।

हिंदी हमारी मातृभाषा है और हम इसी भाषा में बोलने, लिखने समझने में व समझाने में अधिक आत्मविश्वास महसूस करते हैं, लेकिन दुर्भाग्य से हम इसकी तुलना अंग्रेजी से करके इसके गौरव को कम कर देते हैं। मुख्य रूप से अपने क्षेत्र या राष्ट्र में कार्यप्रणाली पर अपनी भाषा अधिक प्रभाव डाल सकती है। इसलिए हमें अपनी हिंदी भाषा में बोलने, लिखने और कार्य करने पर गर्व होना चाहिए।

दूसरी और अंतरराष्ट्रीय मंच के लिए आप अंग्रेजी सीखिए। व्यक्ति दोनों भाषाओं में निपुणता हासिल करें, लेकिन इस्तेमाल वहीं करें, जहां जरूरत हो। आमतौर पर देखा जाता है कि अंग्रेजी भाषा का प्रयोग अनावश्यक प्रभाव जमाने के लिए किया जाता है, जो उचित नहीं है। ये लोग हिंदी के लिए खतरा हैं। ये हिंदी भाषी लोगों को छोटा समझने की चेष्टा करते हैं। मैं चाहता हूं कि हिंदी के प्रति प्रेम रखें। जहां हिंदी सुनने या बोलने वाले हों तो हिंदी का ही इस्तेमाल करें। जहां अंग्रेजी भाषी हों, वहां अंग्रेजी। - प्रो. कर्मपाल नरवाल, निदेशक, एचएसबी, गुजवि
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हिंदी भारतीय अस्मिता की प्रतीक और संस्कृति की संवाहक है। यदि भारतीय सभ्यता और संस्कृति को जानना है तो हिंदी सबसे सशक्त माध्यम है। एक भारतीय होने के नाते हम सभी को हिंदी पर गर्व करना चाहिए और इसके प्रचार-प्रसार को समर्पित रहना चाहिए। सरकार को भी हिंदी को लेकर अपनी नीति स्पष्ट रखनी चाहिए। हिंदी को आधिकारिक रूप से राष्ट्रभाषा घोषित करे, इससे पूरे देश का मान बढ़ेगा। घरों व शिक्षण संस्थानों में भी हमें बच्चों पर अंग्रेजी थोपना बंद करके उन्हें हिंदी के प्रेरित करने की जरूरत है। - डॉ. सुरेंद्र कुमार बिश्नोई, हिंदी प्राध्यापक, डीएन कॉलेज।
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