दिव्यांग हुए सैनिक के बेटे को आरक्षण का लाभ देने से इनकार को अनादर मानते हुए पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने हरियाणा कर्मचारी चयन आयोग (एचएसएससी) पर 10 लाख रुपये जुर्माना लगाया है। साथ ही याचिकाकर्ता को नियुक्ति देने का आदेश जारी किया है।
चरखी दादरी निवासी राहुल ने याचिका दाखिल करते हुए हाईकोर्ट को बताया कि याची दिल्ली विश्वविद्यालय से एमएससी (आपरेशनल रिसर्च) है। याची ने जून 2021 में एचएसएससी द्वारा विज्ञापित सब इंस्पेक्टर के पद के लिए आवेदन किया था। उसने हरियाणा सरकार के नियमों के अनुसार 50 प्रतिशत से अधिक विकलांग भूतपूर्व सैनिक (ईएसएम-विकलांग) के आश्रितों के कोटा में आवेदन किया था।
याचिकाकर्ता के पिता को वर्ष 1995 में (श्रीलंका) में सैन्य अभियान (आपरेशन पवन) के दौरान राकेट लाॅंचर से चोटें आई थीं। उनके दोनों हाथ क्षतिग्रस्त हो गए थे, जिसके परिणामस्वरूप 90 प्रतिशत स्थायी विकलांगता हो गई। विकलांगता के परिणामस्वरूप उन्हें सेना सेवा से छुट्टी दे दी गई। भूतपूर्व सैनिकों के आश्रित (कार्रवाई में मारे गए/50 प्रतिशत से अधिक विकलांगता) कोटा के तहत एसआई के पद पर चयन में आरक्षण था।
इन पदों के लिए लिखित परीक्षा 26 सितंबर, 2021 को आयोजित की गई थी और अंतिम परिणाम 31 अक्टूबर, 2021 को घोषित किया गया था। याचिकाकर्ता के अनुसार उसने अंतिम चयनित उम्मीदवार से 57 अंक अधिक अंक प्राप्त किए थे, अंतिम चयनित उम्मीदवार जिसने ईएसएम/डीईएसएम विकलांग (सामान्य श्रेणी) के तहत केवल 35.2 अंक प्राप्त किए थे।
याची को चयन से इस आधार पर वंचित किया गया है कि उसने आवेदन पत्र भरते समय वैध प्रमाण पत्र संलग्न नहीं किया था, इसलिए उसे सामान्य ईएसएम श्रेणी में माना गया है। सभी पक्षों की जांच करने के बाद, हाई कोर्ट ने पाया कि सचिव, राज्य सैनिक बोर्ड, हरियाणा पूर्व सैनिकों/के आश्रितों को जिला सैनिक बोर्ड द्वारा रोजगार के लिए प्रोफार्मा के अनुसार पात्रता प्रमाण पत्र जारी करता है। उक्त प्रोफार्मा में ऐसा कोई कालम नहीं है कि ईएसएम (विकलांग) के आश्रित की श्रेणी के लिए कोई विशेष प्रमाण पत्र जारी किया जाना है। इस प्रकार आनलाइन आवेदन भरते समय याचिकाकर्ता द्वारा संलग्न पात्रता प्रमाण पत्र वैध था और इसके अलावा, उसे दंडित नहीं किया जा सकता है। इसी के साथ कोर्ट ने आयोग को दस लाख रुपये जुर्माना लगाने व याची को नियुक्ति पत्र देने का आदेश दिया। हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि आयोग ने सेना की कार्रवाई में घायल हुए एक सैनिक के प्रति पूर्ण अनादर दिखाया है व उसके आश्रित बेटे को आरक्षण का लाभ देने से इनकार किया है। याचिकाकर्ता को नवंबर 2021 से ही मुकदमेबाजी का सहारा लेने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है।