इसे बचाने के लिए याचिकाकर्ताओं ने बाहर से पैसा लेकर बैंक को भुगतान किया क्योंकि यदि बैंक प्रापर्टी बेचता तो वह औने-पौने दामों पर बिकती जबकि इसकी कीमत 60 लाख से अधिक है। अब बाहर से लिए गए पैसे का भुगतान करने के लिए उनके पास प्रापर्टी बेचने के अलावा कोई और जरिया नहीं है। बैंक की ओर से बताया गया कि प्रापर्टी की एवज में लिए गए कर्ज का भुगतान किया जा चुका है।
सभी पक्षों को सुनने के बाद हाईकोर्ट ने अपना फैसला सुनाते हुए कहा कि बच्चे के माता-पिता को भी कोर्ट की अनुमति के बिना नाबालिग की प्रापर्टी बेचने का अधिकार नहीं है। कोर्ट का भी यह फर्ज बनता है कि नाबालिग की प्रापर्टी बेचने की अनुमति तभी दी जाए जब उसका प्रयोग बच्चे की भलाई के लिए हो।
इस मामले में यदि याचिकाकर्ता बैंक के कर्ज का भुगतान नहीं करते तो प्रापर्टी का औने-पौने दाम में बिकना तय था। याचिकाकर्ता ने बाहर से पैसा लेकर प्रापर्टी को बिकने से बचाया है ऐसे में उन्हें इस प्रापर्टी को बेचने की अनुमति देना उचित है क्योंकि यह नाबालिग के भी हित में है।