पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने अहम आदेश जारी करते हुए एनडीपीएस के मामले में पांच माह की गर्भवती महिला को प्रसव के 1 वर्ष बाद तक के लिए अंतरिम जमानत दे दी है।
याचिकाकर्ता 24 वर्ष की एक युवा महिला है और बुरी संगति में रहती थी। याची के बार-बार अपराध करने से ज्यादा अहम यह है कि वह गर्भवती है। गर्भावस्था के दौरान जेल में बंद गर्भवती मां को जमानत पर निर्णय के समय सहानुभूति और करुणा के साथ विचार करने की आवश्यकता है। मातृत्व के पालने और सभ्यता की नर्सरी घास के मैदानों में होती है, पिंजरों में नहीं। महिला का गर्भवती होना एक विशेष परिस्थिति है, जिसे समझना जरूरी है।
मां की कैद की अवधि तो एक दिन खत्म हो जाएगी, लेकिन बच्चे के जन्म और पालन-पोषण के स्थान के बारे में पूछे जाने पर उस पर जो कलंक लगेगा, वह हमेशा बना रहेगा। इससे जीवन के प्रति बच्चे का नजरिया बदल जाएगा, समाज में बच्चे के बारे में जो धारणा बनेगी और जेल की चारदीवारी से बाहर जिस तरह से बच्चा बाहरी दुनिया को देखेगा, उस पर इसका प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा। अदालत ने कहा कि अगर बाद में मां को आरोपों से मुक्त कर दिया जाता है या उसे बरी कर दिया जाता है, तो यह दर्दनाक होगा। एक उदार और गतिशील संविधान वाले प्रगतिशील समाज के रूप में, नवजात शिशु को कैद करना अंतत: गंभीर अन्याय को होगा।