नाबालिग से दुष्कर्म मामले में हाईकोर्ट ने आरोपी की अग्रिम जमानत याचिका खारिज कर दी। उच्च न्यायालय ने मामले की सुनवाई करते हुए टिप्पणी की कि पीड़िता के अंग से लिए सैंपल का आरोपी से डीएनए मिलान न होना उसे निर्दोष साबित नहीं करता है।
15 वर्षीय किशोरी से दुष्कर्म के मामले में आरोपी की अग्रिम जमानत याचिका को खारिज करते हुए पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने स्पष्ट कर दिया कि पीड़िता के अंग से लिए सैंपल का आरोपी से डीएनए मिलान न होना उसे निर्दोष साबित नहीं करता है। पुलिस की तरफ क्लोजर रिपोर्ट तैयार करने को भी हाईकोर्ट ने पॉक्सो एक्ट के प्रावधानों के खिलाफ बताते हुए कहा कि यह गंभीर मामला है, पुलिस क्लोजर रिपोर्ट कैसे दाखिल कर सकती है।
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हाईकोर्ट में फाजिल्का निवासी 15 वर्षीय किशोरी से दुष्कर्म के आरोपी की अग्रिम जमानत याचिका सुनवाई के लिए पहुंची थी। 37 वर्षीय याचिकाकर्ता पर पीड़िता ने आरोप लगाया था कि वह उसे घसीट कर खेतों में ले गया और एक फार्म हाउस में यौन उत्पीड़न किया। बयान के आधार पर याची के खिलाफ दुष्कर्म, धमकी, घर में जबरन घुसने और पॉक्सो की धारा 4 (यौन उत्पीड़न) के तहत एफआईआर दर्ज की गई थी।
याची ने कहा कि डीएनए विश्लेषण के लिए किशोरी के गुप्तांग से स्वैब लिए गए थे। डीएनए रिपोर्ट के मिलान न होने के आधार पर एसएचओ ने क्लोजर रिपोर्ट तैयार की है।
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हाईकोर्ट ने फैसला सुनाते हुए कहा कि जांच एजेंसी नाबालिग के यौन शोषण के मामले में जांच के स्तर पर कैसे क्लोजर रिपोर्ट दाखिल कर सकती है। यह क्लोजर रिपोर्ट पॉक्सो एक्ट के प्रावधान के खिलाफ है। इन नमूनों व अन्य सबूतों पर अभी ट्रायल कोर्ट को सुनवाई करनी है। केवल डीएनए जांच रिपोर्ट याचिकाकर्ता के पक्ष में होने के आधार पर, वह गिरफ्तारी से पहले अग्रिम जमानत का हकदार नहीं है। याची पीड़िता का पड़ोसी है, दोनों की आयु के बीच बहुत अधिक फर्क है और पीड़िता के बीच कोई पिछली दुश्मनी नहीं है। पीड़िता ने अपने बयान में पूरी कहानी स्पष्ट की है और ऐसे में याची जमानत का हकदार नहीं है।