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आरक्षण आंदोलनः 26 साल से हक की लड़ाई लड़े जाट, विवाद पर स्पेशल रिपोर्ट

Mon, 06 Mar 2017 04:16 PM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, चंडीगढ़
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हरियाणा जाट आरक्षण आंदोलन - फोटो : अमर उजाला
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हरियाणा के जाट पिछले 26 सालों के आरक्षण के लिए लड़ाई लड़ रहे हैं। तब से अब तक आंदोलन चला ही आ रहा है। बीच में कई उतार-चढ़ाव आए। 1990 में जाट आरक्षण की मांग पहली बार उठी। सरकार ने अक्तूबर 1990 में गुरनाम सिंह आयोग गठित किया। इसने अपनी रिपोर्ट जनवरी 1991 में सरकार को सौंपी, जिसमें 10 जातियों अहीर, गुर्जर, मेव, जाट, सिख जाट, बिश्नोई, सैनी, रोड़, त्यागी और राजपूत को पिछड़ा माना।
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आयोग की रिपोर्ट को सात फरवरी 1991 से लागू किया गया, लेकिन मई 1991 में हरियाणा में दूसरी सरकार आने पर दो व्यक्तियों ने मिलकर सर्वोच्च न्यायालय में याचिका नंबर 326-360, 12-09-1991 दायर की। इसके आधार पर सर्वोच्च न्यायालय ने हरियाणा सरकार से पूछा तो सरकार ने जवाब दिया कि इस रिपोर्ट पर जारी अधिसूचना को स्टे कर दिया है।

इनमें से किसी भी जाति के पैरवी नहीं करने पर सर्वोच्च न्यायालय ने रिपोर्ट को ही निरस्त कर दिया। हरियाणा में दोबारा आरक्षण को लेकर पहली बैठक भिवानी में 26 जनवरी 2008 को पूर्व कमांडेंट हवा सिंह सांगवान और यशपाल मलिक ने कुछ जाट नेताओं को साथ लेकर की। वर्ष 2016 में हिंसक जाट आंदोलन के दौरान कुल 31 लोगों की जान गई। इनमें 18 जाट और 13 गैर जाट शामिल हैं। 
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सरकार निजी, सरकारी व अन्य उपक्रमों की संपत्ति के नुकसान का दावा करती है। यह आंकड़ा सरकार ने विधानसभा में मामला उठने पर सार्वजनिक किया था। एसोचैम ने आंदोलन से बीस हजार करोड़ रुपये के नुकसान की रिपोर्ट पेश की थी, जिसे सीएम ने सिरे से खारिज कर दिया था।

 

राम सिंह केस बना सरकार का सिरदर्द

हरियाणा जाट आरक्षण आंदोलन
कानूनी पहलू सरकार के आड़े आ जाते हैं और दो बार सरकार से आरक्षण मिलने के बाद पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट इस पर रोक लगा चुका है। जाट आरक्षण की राह में राम सिंह केस सरकार का सबसे बड़ा सिरदर्द बना हुआ है। याचिकाकर्ताओं ने राम सिंह केस को आधार बनाने के साथ ही केसी गुप्ता आयोग पर भी सरकार को खूब घेरा। आंकड़े जुटाने वाले खजान सिंह सांगवान की रिपोर्ट को नेशनल कमीशन फॉर बैकवर्ड क्लास (एनसीबीसी) नकार चुका है।

ऐसे में अब सरकार के पास एक बड़ा हथियार एक्ट को बनाने के लिए विधायिका की ओर से इस्तेमाल अधिकार ही हैं। हालांकि, कोर्ट की सुनवाई में सरकार ने याची के हर दावे और दलील को खारिज करने के लिए सुप्रीम कोर्ट के वकील की सेवाएं ली हैं। वर्तमान में आरक्षण को लेकर सभी पक्षों की दलीलें पूरी हो चुकी हैं और अब बहस आंकड़ों पर हो रही है।

हाईकोर्ट संकेत दे चुका है कि वह इस मामले का जल्द निपटारा करने के मूड में है और ऐसे में आंदोलन पर बैठे जाटों की निगाह भी हाईकोर्ट के फैसले पर टिकी है। सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र की ओबीसी सूची में जाटों को शामिल करने के केंद्र सरकार के फैसले को खारिज किया तो हाईकोर्ट में राम सिंह केस को आधार बनाते हुए जाटों सहित 5 जातियों को विशेष पिछड़ा वर्ग के तहत दिए गए आरक्षण पर हाईकोर्ट ने रोक लगा दी।

राम सिंह केस में सुप्रीम कोर्ट ने केसी गुप्ता आयोग की रिपोर्ट को खारिज किया, यह दलील देते हुए याची ने हरियाणा में भी जाटों के आरक्षण को खारिज करने की अपील की। 27 मई 2015 को हाईकोर्ट ने इन सभी जातियों के आरक्षण पर रोक लगा दी, जिसके बाद हरियाणा में फरवरी 2016 में जाटों ने आरक्षण के लिए आंदोलन आरंभ कर दिया।

इस आदेश को बनाया गया आंदोलन का आधार

हरियाणा जाट आरक्षण आंदोलन - फोटो : amar ujala
हरियाणा में आरक्षण 70 फीसदी तक हो जाता, जो सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों की अनदेखी है। याचिका में कहा गया कि सुप्रीम कोर्ट ने वर्ष 1992 में इंदिरा साहनी के केस में फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया था कि नौकरियों में आरक्षण 50 फीसदी से ज्यादा नहीं हो सकता।

इस तरह दिया गया लाभ
हरियाणा में जाटों को आरक्षण का लाभ देने के लिए संविधान में राज्य को दिए गए अधिकार का इस्तेमाल किया गया है। आर्टिकल 15, 16 के क्लॉज 4 में प्रावधान है। इसके तहत राज्य पिछड़ा वर्ग के उत्थान के लिए उन्हें आरक्षण देने की व्यवस्था कर सकती है।

इन जिलों में जाटों का प्रभाव ज्यादा
इसके अलावा फरीदाबाद, गुरुग्राम, पलवल, फतेहाबाद, सिरसा, कुरुक्षेत्र, यमुनानगर, करनाल, पानीपत में भी जाट हैं। अंबाला और यमुनानगर में जट सिख हैं। महेंद्रगढ़, रेवाड़ी व मेवात में जाट कम हैं।

एनसीबीसी ने केसी गुप्ता आयोग की रिपोर्ट पर सवाल उठाए

जाट आरक्षण आंदोलन - फोटो : अमर उजाला
एनसीबीसी ने हरियाणा के जाटों को आरक्षण का लाभ केंद्र में न दिए जाने की सिफारिश करते हुए केसी गुप्ता आयोग की रिपोर्ट पर सवाल उठाए थे। एनसीबीसी ने कहा था कि केसी गुप्ता की रिपोर्ट एमडीयू रोहतक के प्रो. केएस सांगवान की रिपोर्ट पर आधारित है। सांगवान के आंकड़ों को आधार बनाते हुए 2013 में केसी गुप्ता आयोग ने रिपोर्ट सौंपी थी। एनसीबीसी ने कहा कि इस रिपोर्ट में सांगवान ने जाटों की तुलना ब्राह्मणों व राजपूतों से की थी, जबकि पिछड़ेपन के मामले में यदि देखें तो अहीर, कुर्मी और गुज्जरों से जाट कहीं अधिक आगे हैं। रिपोर्ट में 12 सोशल इंडीकेटर, 7 एजुकेशन इंडीकेटर और 5 इकोनॉमिक इंडीकेटर पर जाटों को परखा गया।

केसी गुप्ता की रिपोर्ट पर सरकार का स्टैंड
हरियाणा सरकार की दलील है कि सुप्रीम कोर्ट ने केसी गुप्ता आयोग की सिफारिशों को खारिज नहीं किया था, बल्कि उन्होंने एनसीबीसी की रिपोर्ट को मंजूरी दी थी। एनसीबीसी ने रिपोर्ट में केसी गुप्ता आयोग की सिफारिशों को न मानने का फैसला लिया था। ऐसे में यह नहीं कहा जा सकता है कि सुप्रीम कोर्ट ने केसी गुप्ता आयोग की सिफारिशों को खारिज किया था।

केंद्र में है मामला
केंद्र सरकार ने जाटों को केंद्रीय ओबीसी सूची में शामिल करने का फैसला लिया था। इसके लिए 4 मार्च 2014 को नोटिफिकेशन जारी की गई थी। नोटिफिकेशन के माध्यम से बिहार, गुजरात, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, मध्य प्रदेश, दिल्ली, यूपी और उत्तराखंड के जाटों को केंद्रीय ओबीसी सूची में शामिल किया गया था। विवाद कैबिनेट द्वारा नेशनल कमिशन फॉर बैकवर्ड क्लास की रिपोर्ट को नजरअंदाज करने के चलते आरंभ हुआ। एनसीबीसी ने 26 फरवरी 2014 को सौंपी अपनी रिपोर्ट में जाटों को पिछड़ा वर्ग के तहत आरक्षण न देने की सिफारिश की थी बावजूद इसके 4 मार्च को नोटिफिकेशन के जरिए जाटों को आरक्षण का लाभ दे दिया गया।

नोटिफिकेशन वापिस लेकर सरकार ने बनाया एक्ट

Jat reservation - फोटो : अमर उजाला
हरियाणा सरकार ने नोटिफिकेशन पर फंसे कानूनी पेंच के बाद 31 मार्च 2016 को जाटों सहित अन्य जातियों को विशेष पिछड़ा वर्ग में शामिल करने वाली 2013 की नोटिफिकेशन को तत्काल प्रभाव से वापस लेने का फैसला लिया। इन नोटिफिकेशन को चुनौती देने वाली कुछ याचिकाओं को हाईकोर्ट ने मांग पूरी होने के चलते समाप्त कर दिया। इसी के बाद हरियाणा में पिछडा वर्ग (नौकरियों में आरक्षण और शैक्षणिक संस्थानों में प्रवेश में आरक्षण) एक्ट 2016 बनाया गया। इस एक्ट के माध्यम से जाटों सहित 6 जातियों को आरक्षण का लाभ देने के लिए बीसी ए और बी के बाद सी श्रेणी बनाई है।

हाइकोर्ट में एक्ट को दी गई चुनौती
हाईकोर्ट में मुरारी लाल गुप्ता व अन्य याचिकाकर्ताओं ने आरक्षण को चुनौती देते हुए हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की। हाईकोर्ट ने इन याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए 26 मई 2016 को जाटों सहित 6 जातियों को दिए गए आरक्षण पर रोक लगा दी। हरियाणा सरकार की ओर से लंबित हजारों भर्तियों और शैक्षणिक संस्थानों में प्रवेश प्रक्रिया जारी होने की दलील देते हुए रोक न लगाने की अपील की गई परंतु हाईकोर्ट ने रोक लगाने के अपने आदेशों को नहीं बदला। आरक्षण पर रोक लगाने के बाद हरियाणा में सरकारी पदों पर नियुक्तियों और शैक्षणिक संस्थानों में 10 प्रतिशत का आरक्षण लटक गया।

राज्य पिछड़ा आयोग ने नहीं नकारा

हरियाणा जाट आरक्षण केस
हरियाणा सरकार की दलील है कि नेशनल कमिशन फॉर बैकवर्ड क्लास और स्टेट कमिशन दो अलग-अलग बॉडी हैं। इंदिरा साहनी केस में सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिए थे कि केंद्र व राज्यों में पिछड़ा वर्ग आयोग का गठन अनिवार्य रूप से किया जाए। इसके बाद एनसीबीसी का गठन हुआ और राज्यों ने अपने राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग बनाए। दोनों बॉडी स्वतंत्र हैं और एक-दूसरे की राय को मानने के लिए बाध्य नहीं हैं। भले ही एनसीबीसी ने केसी गुप्ता आयोग की सिफारिशों को नहीं माना परंतु राज्य का कमिशन यदि इसे मान रहा है तो इसे गलत नहीं करार दिया जा सकता है।

इंदिरा साहनी केस और आरक्षण
इंदिरा साहनी केस को आधार बनाते हुए हरियाणा में आरक्षण के 50 फीसदी से अधिक होने को गलत करार दिया जा रहा है। सरकार की दलील है कि आरक्षण की अधिकतम सीमा के 50 प्रतिशत के पार हो सकती है यदि विशेष परिस्थितियां हों और सरकार की राय में किसी जाति को पिछडे़पन से आगे लाना जरूरी हो। हरियाणा सरकार की दलील है कि तमिलनाडु में 69 प्रतिशत आरक्षण है। इसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती तो दी गई है, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इसपर रोक नहीं लगाई है।

चुनौती देने वाले पक्ष की दलील

jat andolan - फोटो : अमर उजाला
याची पक्ष की ओर से कहा गया था कि जब नोटिफिकेशन के जरिए हरियाणा में जाटों को आरक्षण दिया गया था और उसे चुनौती देने वाली याचिका लंबित थी तब हरियाणा सरकार ने कहा था कि समान मामला सुप्रीम कोर्ट में लंबित है और उसके फैसले का इंतजार किया जाए। सुप्रीम कोर्ट में उस केस में हरियाणा सरकार भी प्रतिवादियों की सूची में था। जब हरियाणा सरकार प्रतिवादी है तो उस स्थिति में वहां के आदेश राज्य सरकार पर भी बाध्य हैं। राम सिंह केस को एक्ट बनाते हुए भी विधानसभा के सामने पेश नहीं किया गया।

गुप्ता, सांगवान की रिपोर्ट पर जताई आपत्ति
याची के अनुसार जाटों सहित अन्य को लाभ देने के लिए हरियाणा सरकार ने सर्वे की जिम्मेदारी क्रिड को दी थी और इसके लिए 70 लाख का भुगतान भी किया। क्रिड से अपने पक्ष में रिपोर्ट नहीं आता देख उस एमओयू के स्थान पर यह जिम्मेदारी एमडीयू रोहतक को दे दी गई। वहां के प्रो. खजान सिंह सांगवान को सर्वे का जिम्मा सौंपा गया और उन्होंने बिना फील्ड सर्वे किए ऑफिस में बैठे-बैठे रिपोर्ट जाटों के हक में तैयार कर दी।
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ये हैं जाटों की प्रमुख मांगें

जाट - फोटो : अमर उजाला
- केंद्रीय स्तर पर देश भर के हिंदू, मुस्लिम, सिख व बिश्नोई जाटों को केंद्र की ओबीसी श्रेणी में शामिल करने, हरियाणा सरकार की ओर से छह जातियों को दिए गए आरक्षण को हाईकोर्ट में उचित पैरवी कर संविधान की नौवीं सूची में डाला जाए।
- जाट आरक्षण आंदोलन के दौरान दर्ज सभी मुकदमों की वापसी
- जेलों में बंद युवाओं को तुरंत रिहा किया जाए
- आंदोलन के दौरान हुए शहीदों के आश्रितों को पक्की सरकारी नौकरी
- घायलों को मुआवजा और विकलांगों को मुआवजा व सरकारी नौकरी
- आंदोलन के दौरान और इसके बाद जातीय वैमनस्य फैलाने वाले सांसद राजकुमार सैनी की एथिक्स कमेटी से जांच के बाद सदस्यता रद कर, सांसद व उनके साथियों के खिलाफ आपराधिक धाराओं के तहत मामले दर्ज हों
- आंदोलन के दौरान जातीय द्वेष फैलाने वाले दोषी कर्मचारियों व अधिकारियों की भूमिका की जांच के बाद उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई

दो बार विफल हो चुकी है बातचीत
हरियाणा में इस बार 29 जनवरी से 19 जिलों में जाट आंदोलन चल रहा है। सरकार ने जाटों के बढ़ते दबाव के बाद मुख्य सचिव डीएस ढेसी की अध्यक्षता में पांच सदस्यीय प्रशासनिक अधिकारियों की समिति वार्ता के लिए गठित की है। समिति की दो बार पानीपत के रिफाइनरी गेस्ट हाउस में जाट नेताओं के साथ वार्ता हुई, लेकिन दोनों ही बार बेनतीजा निकली। अब जाट इस समिति से बातचीत के लिए इंकार कर चुके हैं। सीएम ने विधानसभा या मंत्री समूह की उपसमिति गठित करने का आश्वासन दिया है

आंदोलन से बाहर हुए ये जाट
अखिल भारतीय जाट आरक्षण संघर्ष समिति के अध्यक्ष यशपाल मलिक, जाट नेता हवा सिंह सांगवान, सर्व खाप महापंचायत के प्रवक्ता व समैन खाप के अध्यक्ष सूबे सिंह समैन, धर्मपाल छोत, सुरेंद्र दहिया, अशोक बलहारा।
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