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CBI की एक चिट्ठी ने रोका IPS वीके सिन्हा का प्रमोशन

Wed, 09 Mar 2016 12:05 PM IST
हर्ष कुमार सलारिया/अमर उजाला, चंडीगढ़
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सेन्ट्रल ब्यूरो ऑफ इंवेस्टिगेशन - फोटो : फाइल फोटो
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साल 1986 बैच के आईपीएस वीके सिन्हा को प्रमोशन देना तय था, लेकिन सीबीआई की एक चिट्ठी के कारण वे हरियाणा के डीजी बनते-बनते रह गए। सीबीआई की ओर से एक मामले में उनके खिलाफ दी गई अनुशंसा को राज्य सरकार ने गंभीरता से लिया है। सरकार ने उन्हें डीजी विजिलेंस नियुक्त करने का इरादा बदलकर एडीजी विजिलेंस के पद पर तैनात कर दिया है। हालांकि प्रदेश सरकार ने सिन्हा को आरक्षण आंदोलन के दौरान उपद्रव की घटनाओं में हुए नुकसान का ब्योरा जुटाने के लिए नोडल अधिकारी के रूप में अतिरिक्त जिम्मेदारी भी सौंपी है।
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केंद्र में कई साल तक प्रतिनियुक्ति पर रहे सिन्हा की डीजी पद पर प्रमोशन गत एक जनवरी से देय थी। वे प्रदेश में 30 नवंबर, 2015 से खाली पड़े डीजी विजिलेंस के पद पर नियुक्ति पाने के इच्छुक अफसरों की कतार में सबसे आगे थे। प्रदेश के मुख्य सचिव और गृह सचिव की कमेटी ने डीजी विजिलेंस पद के लिए 14 अफसरों का सर्विस रिकार्ड खंगालने के बाद जिन तीन अफसरों के नामों का चयन किया, उनमें बीके सिन्हा के साथ परमिंदर राय और केपी सिंह शामिल थे।

कमेटी ने तीनों नामों का पैनल मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर को भेजा था। पता चला है कि मुख्यमंत्री ने बीके सिन्हा को डीजी विजिलेंस ब्यूरो के पद पर तैनात करने का फैसला ले लिया था, लेकिन पांच अगस्त, 2015 को सीबीआई मुख्यालय नई दिल्ली की ओर से प्रदेश के मुख्य सचिव को एक पत्र भेजा गया। इसमें बीके सिन्हा को फर्जी मुठभेड़ के एक मामले में दोषियों का बचाव करने के लिए जिम्मेदार ठहराया गया।
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साथ ही उन पर उपयुक्त कार्रवाई करने के लिए अनुशंसा भी की गई। इसे  प्रदेश सरकार ने गंभीरता से लिया और अपना फैसला बदल दिया। अब सरकार ने बीके सिन्हा को एडीजी विजिलेंस ब्यूरो नियुक्त कर दिया है। वह 30 सिंतबर, 2019 को रिटायर होंगे। सरकार ने पैनल में शामिल परमिंदर सिंह को डीजी विजिलेंस ब्यूरो नियुक्त किया है।
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बीके सिन्हा के खिलाफ यह है मामला

सीएम मनोहर लाल खट्टर - फोटो : फाइल फोटो
सीबीआई की ओर से प्रदेश के मुख्य सचिव को भेजे गए पत्र में कहा गया है कि 25 अक्तूबर, 1994 में जितेंद्र पहल और रणधीर सिंह की उस समय एनकाउंटर में मौत हो गई थी, जब वे पुलिस कस्टडी में थे। 27 नवंबर, 1995 को पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने इस मामले की जांच सीबीआई को सौंप दी।

सीबीआई ने अपनी जांच में उक्त एनकाउंटर को फर्जी पाया और जींद के तत्कालीन सीआईए के इंस्पेक्टर नार सिंह, सीआईए के कांस्टेबल रमेश चंद्र, सूबे सिंह, तत्कालीन डीजीपी लक्ष्मन दास, एसीबी गुड़गांव के तत्कालीन एसपी वेदप्रकाश वर्मा और तत्कालीन एएसआई (रिटायर्ड) मंगत सिंह गिल को दोषी पाया।

सीबीआई ने जांच पूरी कर उक्त छह लोगों के खिलाफ चार्जशीट दाखिल करते हुए जींद के तत्कालीन एसपी बीके सिन्हा को गवाह बनाया। अंबाला ट्रायल कोर्ट में चले इस केस के दौरान बीके सिन्हा को कुल 17 बार पेश होकर गवाही देने के लिए समन किया गया, लेकिन वह एक बार भी कोर्ट नहीं पहुंचे।

मुख्य सचिव को भेजे पत्र में सीबीआई ने इसे आरोपियों की ओर से अपनाई गई टालमटोल की रणनीति माना। सीबीआई का कहना है कि बीके सिन्हा का बयान मामले के मुख्य आरोपियों लक्ष्मन दास और वीपी वर्मा की मिलीभगत उजागर कर सकता था, लेकिन सिन्हा के गवाही नहीं देने से आरोपियों को लाभ मिला और वे सबूतों के अभाव में बरी हो गए। सीबीआई ने बीके सिन्हा के इस व्यवहार पर उंगली उठाते हुए उनके खिलाफ उपयुक्त कार्रवाई करने की अनुशंसा की।
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