हाऊसिंग बोर्ड के कर्मचारी जसवंत पोसवाल ने हरियाणा के सीनियर आईएएस अशोक खेमका की वजह से आत्महत्या नहीं की थी।
स्थानीय अदालत ने इस मामले में अपने आदेश में कहा कि शिकायतकर्ता नितिन पोसवाल जोकि मृतक कर्मचारी के बेटे हैं, खेमका पर लगाए अपने आरोप साबित करने में पूरी तरह से असफल रहे हैं।
कोर्ट ने यह भी कहा कि खेमका ने तो सस्पेंड क्लर्क जसवंत पोसवाल को दोबारा नौकरी पर आने का मौका भी दिया था।
नारायणगढ़ निवासी नितिन पोसवाल ने अशोक खेमका के खिलाफ केस दायर कर अपने पिता जसवंत पोसवाल को आत्महत्या के लिए मजबूर करने के आरोप में एफआईआर दर्ज करने की गुजारिश की थी।
नितिन का आरोप था कि अशोक खेमका ने वर्ष 2007 में हाऊसिंग बोर्ड में अधिकारी रहते हुए उनके पिता को नौकरी से हटा दिया था, क्योंकि वे कर्मचारी नेता था। नौकरी जाने से आहत उनके पिता ने आत्महत्या कर ली थी।
नितिन का आरोप था कि खेमका ने उनके पिता को प्रताड़ित किया था।
मामले की सुनवाई के बाद कोर्ट ने खेमका को निर्दोष पाया। कोर्ट ने कहा कि जसवंत को शराब निर्भरता से ग्रस्त होने के कारण टर्मिनेट किया गया था।
टर्मिनेशन पत्र में लिखा गया था कि पोसवाल अपनी ड्यूटी पूरी करने के काबिल नहीं हैं। पत्र में यह भी लिखा गया था कि जसवंत अगर खुद को फिट साबित कर देते हैं, तो नौकरी ज्वाइन कर सकते हैं।
साथ ही कोर्ट ने कहा कि शिकायतकर्ता यह आरोप तो लगा रहा है कि उसके पिता ने आत्महत्या कर ली है, लेकिन काफी समय से लापता अपने पिता के बारे में ऐसा कोई ऐसा सबूत नहीं दे पाया कि उसके पिता जिंदा नहीं हैं।