हरियाणा में बदल रहे राजनीतिक समीकरणों को देखते हुए इस बार के चुनाव में वंशवाद और पारिवारिक कलह भी एक मुद्दा बनेगा। राजनीतिक परिवारों के भीतर चल रही इस आंतरिक कलह और वंशवाद को भुनाने का काम भारतीय जनता पार्टी करेगी। हरियाणा में वंशवाद की जड़े बहुत गहरी हैं। 1966 से लेकर अब तक की राजनीति में वंशवाद की यह बेल सूबे में चारों तरफ फैल चुकी है।
ऐसे में भाजपा के खुद को वंशवाद से बचाने में कितना सफल होगी, यह समय बताएगा। कुछ उदाहरण भारतीय जनता पार्टी में भी सामने हैं। लड़ाई को मुद्दा बनाते हुए चुनावी रण में उतरने की तैयारी कर रही भाजपा इस बार कांग्रेस के वंशवाद पर प्रहार करते हुए भूपेंद्र सिंह हुड्डा के सुपुत्र दीपेंद्र हुड्डा को भी कटघरे में खड़ा करने का मन बनाया है। यही बात पार्टी ताऊ देवीलाल और भजनलाल के पारिवारिक सदस्यों को कटघरे में खड़ा कर कहेगी।
हरियाणा में विपक्ष के तौर पर इस बार कांग्रेस को ही देखा जा रहा है। इसके अलावा जेजेपी और इनेलो भी क्षेत्रीय दलों के दौर पर मुकाबल में हैं। ऐसे में पार्टी की अंदरूनी रणनीति क्षेत्रवाद की राजनीति पर भी चोट करने की है। हरियाणा में समान विकास की बात करते हुए सीएम मनोहर लाल इस बार अपने द्वारा प्रत्येक विधानसभा में किए गए कार्यो का लेखा जोखा पेश करेंगे। पार्टी की अंदरूनी रणनीति में परिवारवाद पर हमला बोलने का कहा गया है।
जिसके तहत यह कहा जाएगा कि झूठ, लूट और कूट वाली राजनीति का प्रदेश से अंत हो गया है। हरियाणा के वित्त मंत्री कैप्टन अभिमन्यु ने इसी रणनीति के तहत पूर्व मुख्यमंत्री द्वारा कांग्रेस हाईकमान पर दबाव बनाने के लिए अपने पूर्व प्रदेश अध्यक्ष डा. अशोक तंवर के साथ मारपीट की और इस तरह की राजनीति पर उन्होंने जमकर आलोचना की। उन्होंने कहा है कि 2014 में जनता ने कांग्रेस के नेताओं को सबक सिखा दिया था, इस इस बार प्रदेश की जनता मर्ज को पूरी तरह से समाप्त कर देगी।
भाजपा का तंवर प्रेम
भाजपा नेताओं का कहना है कि कांग्रेस में कलह यहां तक पहुंच गई कि वे अपने प्रदेश अध्यक्ष को नहीं पचा सके। लड़ाई दिल्ली दरबार तक पहुंची और वहां पर हुड्डा का गरूर अड़ गया। जिसके कारण पार्टी को प्रदेश में नेतृत्व बदलना पड़ा। ऐसे में यह नेता समाज का भला क्या करेंगे जो सत्ता की चाहत के लिए अपने ही प्रदेश अध्यक्ष के सिर पर लाठियां पड़वा दें। ऐसे लोग यह चाहते हैं कि राजनीति में सिर्फ उन्हीं का परिवार रहे।
पारिवारिक कलह पर फोकस
जेजेपी और इनेलो पर प्रहार करते हुए भाजपा ने यह रणनीति बनाई है कि दोनों की पारिवारिक लड़ाई उजागर करते हुए यह कहा जाएगा कि दोनों लोग सत्ता की चाह में परिवार से अलग हो गए। यहां तक कि अपने बूढ़े दादा के मान सम्मान का ख्याल भी नहीं रखा। ऐसे में वे प्रदेश की बागडोर को संभालने लायक नहीं रह गए हैं।
खुद को बचाए रखना भी जरूरी
दूसरों पर आरोप लगाने वाली भाजपा स्वयं को परिवारवाद से कितना अलग रख पाएगी यह कहना मुश्किल होगा। पार्टी के गुडग़ांव सांसद राव इंद्रजीत सिंह अपनी पुत्री के लिए टिकट चाह रहे हैं। यह बात किसी से छुपी नहीं है। चौधरी बीरेंद्र सिंह के सुपुत्र हिसार से सांसद हैं और उनकी पत्नी उंचाना से विधायक हैं। ऐसे में इस चुनाव में उंचाना से टिकट किसे मिलेगा इस पर नजरें रहेंगी।
भाजपा में परिवार वाद की राजनीति को नकारा
वित्त मंत्री ने भाजपा में परिवारवाद की बात को पूरी तरह से नकारा व कहा कि यहां पर पार्टी बड़ी है, कांग्रेस की तरह से व्यक्ति विशेष नहीं। चौधर बीरेंद्र सिंह और अहिरवाल से अपनी पुत्री के लिए टिकट की चाह रखने वाले राव इंद्रजीत सिंह के मामले में वित्त मंत्री ने कहा कि किसी भी मंत्री और विधायक के टिकट पक्का होने के प्रश्न पर कहा कि हम कमल के फूल के लिए वोट मांगते हैं, अपने लिए नहीं। भाजपा की लीडरशिप को सारा फैसला करना है कि किसको कहां इस्तेमाल करेगी यह उनको फैसला करना है।
इसका जिक्र भी जरूरी
परिवार वाद की इस राजनीति में पूर्व सीएम भजनलाल का भी जिक्र आएगा। भजनलाल परिवार से उनके पुत्र कुलदीप बिश्नोई, चंद्रमोहन और उनके पुत्र का नाम भी चल रहा है। इसके अलावा बंसीलाल परिवार से किरण चौधरी और उनकी पुत्री श्रुति चौधरी का नाम भी आगे आता है।
सभी नेता समझ चुके हैं कि प्रदेश से भाई- भतीजावाद, क्षेत्रवाद और जातिवाद के युग का समापन हो चुका है। चुनाव से ठीक पहले कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष सैलजा और सीएलपी लीडर पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा को बनाने का कोई खास खास फायदा नहीं होगा। लोकसभा चुनाव में करारी हार के बाद भी पूर्व सीएम भूपेंद्र हुड्डा के 10 साल के शासनकाल में तमाम भ्रष्टाचार क्षेत्रवाद, भाई-भतीजावाद के आरोप, इतना ही नहीं भ्रष्टाचार के आरोपों में आए दिन सीबीआई अदालतों के चक्कर लगा रहे हैं।
- वित्त मंत्री, कैप्टन अभिमन्यु