खेती करने वाले लोगों में पार्किंसन का खतरा ज्यादा है। क्योंकि वे उस दौरान कीटनाशक और रसायन के संपर्क में ज्यादा होते हैं। इससे उनके न्यूरॉस पर दुष्प्रभाव पड़ता है। यह बात पीजीआई के न्यूरोलॉजी विभाग में इलाज के लिए आने वाले मरीजों के क्लीनिक ट्रायल से साबित हुई है। विशेषज्ञों की सलाह है कि जो भी लोग ऐसा काम करते हों जिसमें कीटनाशक और रसायन का संपर्क ज्यादा हो, वे बचाव को लेकर सजग रहें।
डॉ. साहिल ने बताया कि पार्किंसन के मरीज चलते-चलते रुक जाते हैं। इस स्थिति को फ्रिजिंग ऑफ गेट कहा जाता है। इस समस्या के समाधान के लिए पीजीआई सीएसआईओ के साथ मिलकर काम कर रहा है। वहां के वैज्ञानिक ऐसे मरीजों लिए विशेष प्रकार के जूते बना रहे हैं जिसमें लगे सेंसर मरीज को फ्रिजिंग ऑफ गेट की स्थिति में सेंसर के जरिए मस्तिष्क को कंपन भेजने का काम करेंगे। उस सेंसर से सिग्नल मिलने पर मरीज को ब्रेन पुन: एक्टिव हो जाएगा। जल्द ही मरीजों को इसका लाभ मिलेगा।
पार्किंसन मूवमेंट संबंधी एक विकार है, जिसमें हाथ या पैर से दिमाग तक पहुंचने वाली नसें या तंत्रिका काम करने में असमर्थ हो जाती हैं। इसमें व्यक्ति का हाथ पैर से नियंत्रण बहुत कम हो जाता है। आमतौर पर जब दिमाग को संदेश देने वाला डोपामाइन का स्तर कम हो जाता है तब यह बीमारी होती है। वैसे इसके अन्य भी कारक जिम्मेदार हैं।
पार्किंसंन डिसीज के लक्षण अक्सर शरीर के एक तरफ या एक अंग से शुरू होते हैं। जैसे-जैसे यह रोग बढ़ता है वैसे-वैसे यह शरीर के ज्यादा से ज्यादा हिस्से को प्रभावित करने लगता है। जकड़न और कंपकंपी का अनुभव करने से पहले, रोगी को नींद की समस्या, कब्ज, सूंघने की क्षमता में कमी और पैरों में बेचैनी की समस्या भी हो सकती है।