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Surjeet Patar: मां की उदासी ने सुरजीत पातर में पैदा की थी लेखन की धार, बने माडर्न पंजाबी कविताओं के सरताज

Sat, 11 May 2024 05:09 PM IST
निवेदिता वर्मा राजीव शर्मा, संवाद, लुधियाना (पंजाब)

सार

डा. सुरजीत पातर ने देश के अलावा जर्मनी, कोलंबिया, लैटिन अमेरिका, चीन, यूरोप समेत कई देशों में पंजाबी कविता एवं साहित्य का प्रचार प्रसार किया। डा. पातर ने जितना भी लिखा सब प्यारा है और लोगों को भाषा, संस्कृति एवं विरसे से जोड़ कर आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है।
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सुरजीत पातर - फोटो : फाइल
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विस्तार
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दम रख, पातर दम रख, आस न छड्ड दिल थम्म रख, सुपने खुरन न देवीं, अखियां भावें नम रख। पदमश्री डा. सुरजीत पातर के यह शब्द आज फिजा में गूंज रहे हैं, इन लाइनों में वे दिल को मजबूत रखने की बात कर रहे हैं, लेकिन खुद ही दिल के हाथों मजबूर होकर इस संसार को अलविदा कह गए। पातर के अचानक रूख्सत होने से पंजाबी साहित्य जगत ही नहीं, बल्कि हर साहित्य प्रेमी को गहरा आघात लगा है और इस कमी को पूरा नहीं किया जा सकता।
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डा. पातर पंजाबी कविता का युग पुरुष थे और उन्होंने जीवन भर पंजाबी भाषा के विस्तार को लेकर देश विदेश के हर मंच पर अपनी आवाज को बुलंद किया। कहावतें एवं लोक कथाएं भी उनकी कविता की प्रेरणा स्त्रोत रही हैं। 

डा. पातर ने अपने साहित्यक सफर में कठिन बंदिशों से लेकर खुली आसान कविता तक साहित्य के सभी रंगों को एक सूत्र में पिरोया है, ताकि पाठकों की रुचि बरकरार रहे। वे माडर्न पंजाबी कविताओं के सरताज रहे और पंजाबी में आधुनिक सौंदर्य शायरी की शुरुआत का श्रेय भी डा. पातर को ही जाता है, तभी तो उनके नाम के साथ पदमश्री, सरस्वती सम्मान के अलावा कई प्रख्यात सम्मान जुड़े हैं। डा. पातर हमेशा ही युवा कवियों एवं लेखकों के लिए प्रेरणा स्त्रोत बने रहेंगे।
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पातर की प्रख्यात कविताओं की लाइनों में, मैं राहां ते नहीं तुरदा, मैं तुरदा तां राहां बणदे, जुगां तक काफले आऊंदे रहणगे, जो मेरे पिच्छे गवाह बणदे, इसके अलावा मैं तां नहीं रहांगा, मेरे गीत रहणगे, के बाद, दूर रह कर भी जो समाया है मेरी रूह में, पास वालों पर वो शख्स कितना असर रखता होगा। इन शब्दों को भुलाया नहीं जा सकता है।

जालंधर में पैदा हुए थे सुरजीत पातर
वर्ष 1945 में जालंधर जिले के पातर कलां गांव में उनका जन्म हुआ। डा. पातर के गांव में सिर्फ चौथी तक ही स्कूल था। उन्होंने अपनी दसवीं तक की शिक्षा गांव खैहरा मज्जां में की। इसके बाद रंधीर कालेज कपूरथला से स्नातक, पंजाबी विश्वविद्यालय पटियाला से एमए और फिर गुरु नानक देव विश्वविद्यालय से पीएचडी की डिग्री की। इसके बाद डा. पातर ने पंजाब कृषि विश्वविद्यालय में प्रोफेसर की जिम्मेदारी निभाई।

बचपन में ही उनके पिता पारिवारिक जिम्मेदारियों के चलते विदेश चले गए। मां की उदासी डा. पातर को विचलित करती थी और वहीं से ही उनको लिखने का शौक पैदा हो गया और बाद में यहीं शौक जुनून में बदल गया। साठ के दशक में पातर ने कविता लिखना शुरू कर दिया था। बीस साल की उम्र में डा. पातर की कई कविआएं मैग्जीनों में छपना शुरू हो गईं। 1973 में उनकी कोलाज किताब प्रकाशित हुई। इसमें उनके अलावा डा. जोगिंदर सिंह एवं परमिंदरजीत सिंह की भी रचनाएं थीं। इसके बाद 1979 में डा. पातर की पुस्तक हवा विच लिखे हरफ प्रकाशित हुई। डा. पातर की पुस्तक वृक्ष अरज करे के बाद हनेरे विच सुलगदी वर्णमाला संग्रह प्रकाशित हुआ। इस पर उनको भारतीय साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया।

डा. पातर ने लफ्जां दी दरगाह, पतझड़ दी पाजेब, सूरजमीन इत्यादि कविता संग्रह लिखे। उन्होंने कविताओं के अलावा कई पंजाबी नाटकों का भी पंजाबी रूपांतरण किया। दूरदर्शन के लिए उन्होंने सूरज दा सरनावां प्रोग्राम के तहत बाबा फरीद से लेकर शिव कुमार बटालवी तक कार्यक्रम में तीस एपिसोड तैयार किए, डिजाइन किए और प्रस्तुत किए।
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